कथावाचक ने सत्संग के दौरान देवर्षि नारद और सनत कुमारों के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कलयुग के प्रभाव पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि सच्चा साधु वही है जो अपनी चिंता छोड़कर जगत की चिंता और जगदीश के चिंतन में लीन रहे. कथा में कहा गया कि संतों का वास्तविक और परम धन केवल प्रभु का नाम है. वक्ता ने आधुनिक समय में समाज में बढ़ रहे दिखावे और पाखंड की स्थिति पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि कलयुग के असर के चलते शादियों में लेन-देन और मोलभाव जैसी विकृतियां देखने को मिल रही हैं. इसके साथ ही संतों के सान्निध्य और बाह्य आडंबर पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि रील की जिंदगी में असलियत को खोजना अत्यंत कठिन हो गया है. सत्संग का वास्तविक महत्व केवल मृत्युलोक में ही संभव बताया गया.