ओडिशा के पुरी में महाप्रभु जगन्नाथ की बहुड़ा यात्रा आयोजित की गई है. नौ दिनों के प्रवास के बाद भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र मौसी मां के घर से श्रीमंदिर की ओर वापस लौट आए हैं. इस अवसर पर देवशयनी एकादशी व आषाढ़ी एकादशी पर भगवान का सोनावेषा अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसमें उन्हें स्वर्ण मुकुट, स्वर्ण चक्र, गदा, बाजूबंद, कुंडल, तुलसी-वैजयंती मालाओं और पीले वस्त्रों से सजाया गया. भगवान विष्णु और कान्हा जी की पूजा के साथ पंचामृत का भोग लगाया गया और श्रद्धालुओं ने 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' तथा 'जय जगन्नाथ' मंत्र का जाप किया. रथ यात्रा के अंतिम चरण में मिट्टी के घड़ों में दूध, दही और नारियल से निर्मित 'अधर पाना' अर्पित कर पात्र तोड़ा जाता है. इसके बाद 'निलाद्री बीजे' अनुष्ठान के दौरान भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को रसगुल्ला अर्पित करते हैं, जिससे मंदिर के द्वार खुलते हैं और बहुड़ा यात्रा का समापन होता है.