ज्येष्ठ माह की अमावस्या पर शनि जयंती और वट सावित्री व्रत का संयोग बन रहा है. शनिवार को अमावस्या होने के कारण इसे शनैश्चरी अमावस्या कहा जा रहा है, जिसमें केदार योग का निर्माण हो रहा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनिदेव की विधि-विधान से पूजा और दान-पुण्य करने से शनि दोष और साढ़ेसाती के प्रभावों से मुक्ति मिलती है. इस दिन पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना और काले तिल का दान करना फलदायी माना गया है.