आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित पुत्रिका यानी जितिया व्रत रखा जाता है. इस पावन अवसर पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और मंगल कामना के लिए चौबीस घंटे से अधिक समय तक निर्जला उपवास रखती हैं. इस व्रत से राजा जीमूतवाहन के त्याग और महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित को जीवनदान देने की पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. अष्टमी को प्रदोष काल में कुशा से जीमूतवाहन और गोबर से चील-सियारीन की प्रतिमा बनाकर पूजन का विधान है. इसके साथ ही इस तिथि पर 16 दिनों तक चलने वाले महालक्ष्मी व्रत का समापन भी होता है. पितृपक्ष में पड़ने वाले इस संयोग पर मां लक्ष्मी की पूजा, चंद्रमा को अर्घ्य और श्री सूक्तम के पाठ से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है.