योग, ध्यान और साधना के जरिए आत्मा का परमात्मा से मिलन संभव माना जाता है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि यह श्वास, ध्यान और जीवन शैली का एक समग्र विज्ञान है। वैदिक काल से चली आ रही यह साधना मन को एकाग्र करती है और तनाव को दूर कर जीवन में संतुलन लाती है। महर्षि पतंजलि ने चित्त वृत्तियों के नियंत्रण को योग कहा है और इसके आठ अंग बताए हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन आठों अंगों को मिलाकर अष्टांग योग कहा जाता है। योग सूत्र की रचना के कारण महर्षि पतंजलि को योग का पिता कहा जाता है। योग सूत्र को चार भागों में बांटा गया है, जिन्हें पाद कहते हैं- समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पाद और कैवल्य पाद। अष्टांग योग के पालन से मनुष्य का तन स्वस्थ और मन शांत रहता है। इसके अभ्यास से इंद्रियों पर पूर्ण संयम प्राप्त होता है और आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर पहुंचकर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।