गुड न्यूज़ टुडे के कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में शिव तांडव स्तोत्र के महत्व, उत्पत्ति और इसके पाठ के नियमों की विस्तृत जानकारी दी गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव तांडव स्तोत्र की रचना रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की थी। तांडव शब्द तंदूर से बना है, जिसका अर्थ उछलना है। भगवान शिव के तांडव के दो मुख्य स्वरूप हैं: रौद्र तांडव और आनंद तांडव। ज्योतिष के अनुसार, सेहत संबंधी समस्याओं, शत्रु बाधा, आर्थिक समस्याओं या अनिष्टकारी ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए शिव तांडव स्तोत्र का पाठ लाभदायक माना जाता है। इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल या प्रदोष काल में मन को एकाग्र करके, त्रिपुंड, भस्म और रुद्राक्ष धारण कर संकल्प के साथ करना चाहिए। ग्रहण काल, ब्रह्म मुहूर्त तथा त्रयोदशी तिथि को पाठ करने से इसके प्रभाव में वृद्धि होती है। इसके नियमित पाठ से आत्मबल, वाणी की शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।