सनातन संस्कृति में मौली या कलावा को देवों द्वारा दिया गया रक्षा सूत्र माना जाता है. किसी भी मांगलिक कार्य, पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान के दौरान कलाई पर लाल धागा यानी कलावा बांधने की प्राचीन परंपरा रही है. कलावा को त्रि शक्तियों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, भगवान वामन के अवतार के समय देवी लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था, जिससे रक्षाबंधन पर्व की शुरुआत हुई. कलावा धारण करने से न केवल आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ मिलते हैं, बल्कि इसके कई चिकित्सकीय व वैज्ञानिक फायदे भी हैं. यह शरीर में कफ, वात और पित्त के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है. इसके अलावा कलाई के एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दबाव बनने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और दिल, दिमाग व पेट से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलती है. मौली बांधने और उतारने के विशेष नियम बताए गए हैं. मंगलवार और शनिवार का दिन कलावा बदलने के लिए शुभ माना जाता है. अलग-अलग मनोकामनाओं के लिए अलग रंग का कलावा धारण किया जाता है.