श्री हरि विष्णु के एक हज़ार नामों का संकलन ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ महाभारत, पद्म पुराण और मत्स्य पुराण में वर्णित है. इस पाठ को नियम और विधिपूर्वक करने से वैवाहिक बाधाएं, पारिवारिक क्लेश, व्यापारिक समस्याएं और जीवन के तमाम संकट दूर होते हैं. महाभारत युद्ध के समय मृत्युशैया पर लेटे भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को यह पाठ करने की सलाह दी थी. ज्योतिषीय दृष्टि से यह पाठ कुंडली में कमजोर अथवा पीड़ित बृहस्पति के दुष्प्रभावों को शांत करता है. इसका शुभारंभ शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को अभिजीत मुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है. पूजन में पीले वस्त्र, हल्दी की माला, तुलसी दल और अष्टगंध का प्रयोग विशेष महत्व रखता है, जबकि चावल का उपयोग वर्जित बताया गया है. इसके अलावा, पितृपक्ष में तिल, तेल, वस्त्र और अन्य वस्तुओं के दान का भी विशेष पुण्य फल मिलता है.