वृंदावन के हृदय स्थल में विराजमान श्री बांके बिहारी जी की महिमा और उनके प्राकट्य की अलौकिक कथा इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र है. मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में स्वामी हरिदास की संगीत साधना और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण और राधा रानी एक ही विग्रह में समाहित होकर निधिवन में प्रकट हुए थे. इस स्वयंभू मूर्ति की विशेषता यह है कि इसमें राधा-कृष्ण का संयुक्त रूप है और भगवान त्रिभंगी मुद्रा में विराजमान हैं. मंदिर की अनूठी परंपराओं के अनुसार, यहाँ साल भर मंगला आरती नहीं होती क्योंकि भक्त मानते हैं कि बाल स्वरूप बिहारी जी रात में रास रचाकर देर से विश्राम करते हैं. साथ ही, बिहारी जी के नयनों के तीव्र आकर्षण और भक्त के वशीभूत होकर उनके साथ चले जाने के डर से हर दो मिनट में गर्भगृह का पर्दा गिरा दिया जाता है.