भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा का समापन नीलाद्री विजय अनुष्ठान के साथ हुआ. बहुड़ा यात्रा, सुना वेष और अधर पाना की रस्मों के बाद तीनों देवताओं के विग्रहों को पहंडी यात्रा के माध्यम से श्रीमंदिर के गर्भगृह में रत्न सिंहासन पर दोबारा विराजमान कराया गया. परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ के भाई-बहनों संग यात्रा पर जाने से माता लक्ष्मी रुष्ट हो गई थीं और उन्होंने मंदिर का जय-विजय द्वार बंद कर दिया था. भगवान जगन्नाथ ने माता लक्ष्मी को मनाने के लिए पारंपरिक श्लोकों के जरिए संवाद किया और भेंट स्वरूप रसगुल्ला अर्पित कर उनका मान-मनौवल किया. इसके बाद माता लक्ष्मी का क्रोध शांत हुआ और मंदिर का द्वार खोल दिया गया. इस खास अवसर पर ओडिशा में रसगुल्ला दिवस मनाया जाता है. मंदिर में प्रभु को 'खीरा मोहन' यानी रसगुल्ले का विशेष भोग लगाया जाता है. भक्त इस अद्भुत धार्मिक अनुष्ठान और दुर्लभ दर्शन के साक्षी बने.