सिडनी यूनिवर्सिटी और मर्डोक चिल्ड्रन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर तेजी से घट रहा है. 82 देशों के डेटा पर आधारित इस शोध में भारत की स्थिति सर्वाधिक चिंताजनक है. रिपोर्ट 2035 तक इस संकट के गहराने की चेतावनी देती है. एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के मुख्य कारणों में दवाओं का अनावश्यक उपयोग, अधूरा कोर्स, बिना प्रिस्क्रिप्शन बिक्री और ऑनलाइन फार्मेसियों द्वारा डमी पर्ची का इस्तेमाल शामिल है. पोल्ट्री फार्म और कृषि के जरिए यह रसायन खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर रहा है, जबकि पीएम 2.5 प्रदूषण हवा से रेजिस्टेंट बैक्टीरिया फैला रहा है. आईसीएमआर की रिपोर्ट और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसके अंधाधुंध इस्तेमाल पर चिंता जताई है. दिल्ली जैसे शहरों में 'सुपरबग' का खतरा बढ़ गया है, जिन पर दवाएं बेअसर हैं. विशेषज्ञों ने इसे मेडिकल साइंस का परमाणु बम बताते हुए स्पष्ट किया है कि वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक का उपयोग नहीं करना चाहिए. इस संकट से बचने के लिए सख्त नियमों और 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण की आवश्यकता है.