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Sheetal Devi: एशियन पैरा गेम्स में 3 मेडल जीतने वाली जम्मू-कश्मीर की 16 साल की शीतल देवी की कहानी जानिए

Asian Para Games 2023: शीतल देवी फोकोमेलिया से पीड़ित हैं. इस बीमारी में अंग अविकसित होते हैं. शुरुआत में शीतल ठीक से धनुष पकड़ भी नहीं पाती थीं. लेकिन धीरे-धीरे ट्रेनिंग के बाद ये आसान हो गया और अब शीतल ने एशियन पैरा गेम्स में 3 मेडल हासिल किया है.

Asian Para Games 2023 में 16 साल की शीतल देवी ने 3 मेडल हासिल किए (Photo/Twitter)
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 27 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 11:53 AM IST

चीन में आयोजित एशियन पैरा गेम्स में 3 मेडल जीतने वाली 16 साल की दिव्यांग शीतल देवी जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ की रहने वाली हैं. वर्ल्ड आर्चरी के मुताबिक शीतल देवी इंटरनेशनल लेवल पर प्रतिस्पर्धा करने वाली बिना हाथों वाली पहली महिला तीरंदाज हैं. शीतल देवी ने मिक्स्ड डबल्स और सिंगल्स में गोल्ड मेडल जीता है. जबकि विमेंस डबल्स में सिल्वर मेडल हासिल किया है.

फोकोमेलिया से पीड़ित हैं शीतल-
आर्चर शीतल देवी का जन्म फोकोमेलिया के साथ हुआ था. यह एक गंभीर बीमारी है. इसमें अंग अविकसित होते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक शीतल देवी ने बताया कि शुरुआत में तो मैं धनुष ठीक से उठा भी नहीं पाती थी, लेकिन कुछ महीनों के अभ्यास के बाद ये आसान हो गया.

शीतल ने बताया कि मेरे माता-पिता को हमेशा मुझपर भरोसा था. गांव में मेरे दोस्तों ने भी साथ दिया. एक चीज मुझे पसंद नहीं आई. जब लोगों को पता चलता था कि मेरे हाथ नहीं हैं, तो उनके चेहरे का भाव बदल जाता था. अब ये मेडल साबित करते हैं कि मैं खास हूं. ये मेडल सिर्फ मेरे लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के हैं.

2 साल पहले शुरू की ट्रेनिंग-
शीतल देवी ने 2 साल पहले धनुष-बाण के साथ ट्रेनिंग शुरू की थी और अब इतने सारे मेडल जीत लिए हैं. हांगझोऊ में शीतल देवी ने सरिता के साथ जोड़ी बनाकर विमेंस डबल्स में सिल्वर मेडल हासिल किया. जबकि राकेश कुमार के साथ मिक्स्ड डबल्स में गोल्ड मेडल हासिल किया.

शीतल देवी का आर्चर के तौर पर सफर साल 2021 में उस समय शुरू हुआ, जब उन्होंने किश्तवाड़ में भारतीय सेना के एक युवा कार्यक्रम के लिए नामांकन किया. अपनी एथलेटिक प्रतिभा के कारण शीतल ने स्काउट्स का ध्यान आकर्षित किया.
इसके बाद आर्मी ने शीतल के लिए कृत्रिम हाथ के लिए बेंगलुरू में मेजर अक्षय गिरीश मेमोरियल ट्रस्ट से संपर्क किया. ट्रस्ट ने स्टोरीटेलिंग प्लेटफॉर्म Being You से संपर्क किया. हालांकि प्रोस्थेटिक फिट नहीं हुआ. ऐसा लगने लगा कि शीतल का करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा.

लेकिन शीतल का पेड़ों पर चढ़ना उसके करियर के लिए फायदेमंद साबित हुआ. जब स्पोर्ट्स फिजियोथेरेपिस्ट श्रीकांत अयंगर ने उसका मूल्यांकन किया तो पाया कि शीतल के शरीर का ऊपरी हिस्सा बहुत मजबूत है. उन्हें टेस्ट में 10 में से 8.5 अंक मिले. अयंगर ने तीरंदाजी, तैराकी और दौड़ का सुझाव किया.

शीतल की ट्रेनिंग के लिए कैसे हुई तैयारी-
इसके बाद ये फैसला किया गया कि शीतल देवी ने कटरा में श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में ट्रेनिंग लेंगी. कोच अभिलाषा चौधरी और कुलदीप वेदवान ने कभी तीरंदाज को बिना हथियार के ट्रेनिंग नहीं दी थी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अभिलाषा चौधरी ने बताया कि हमने स्थानीय रूप से निर्मित रिलीजर को शोल्डर रिलीजर में बदला. उसके तीर को छोड़ने में मदद करने के लिए ट्रिगर बनाने के लिए ठोड़ी और मुंह के लिए एक स्ट्रिंग मैकेनिज्म भी एक साथ रखा.

शीतल ने पहली बार जीता मेडल-
शीतल शुरुता में रोजाना 50-100 तीर चलाती थीं. जैसे-जैसे वक्त बीतता गया, ये गिनती 300 तक पहुंच गई. ट्रेनिंग के 6 महीने बाद शीतल ने वो कर दिखाया, जिसका सबको इंतजार था. शीतल ने सोनीपत में पैरा ओपन नेशनल्स में सिल्वर मेडल हासिल किया. शीतल ने बताया कि जब कुलदीप सर ने पहली बार मुझे धनुष की ट्रेनिंग दी तो मैंने सोचा कि मैं इसे कभी नहीं कर पाऊंगी. लेकिन उन्होंने मुझे टेक्निक समझाई तो मुझे लगा कि इसे आजमाना चाहिए.

खेतों में काम करते हैं पिता-
शीतल देवी के पिता खेतों में काम करते हैं. शीतल ने बताया कि मेरे पिता पूरे दिन चावल और सब्जी के खेत में काम करते थे. जबकि मां परिवार की 3-4 बकरियों की देखभाल करती थीं. किसी तरह से घर का खर्च चलता था. बचत करना मुश्किल था.

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