कल्पना कीजिए... किसान खेत में खड़ा है, फसल की पत्तियों पर काले धब्बे, पीलापन या सड़न दिखाई देती है. पहले उसे बीमारी पहचानने के लिए कृषि विशेषज्ञों के चक्कर लगाने पड़ते थे या फिर अनुमान के आधार पर महंगे कीटनाशक खरीदने पड़ते थे. लेकिन अब सिर्फ मोबाइल से एक फोटो खींचते ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कुछ ही सेकंड में बीमारी की पहचान करेगा, उसका कारण बताएगा और यह भी बताएगा कि कौन-सी दवा कितनी मात्रा में और किस तरीके से छिड़कनी है. यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि IIIT कोटा के वैज्ञानिकों की विकसित की गई स्वदेशी तकनीक है, जिसने भारत ही नहीं बल्कि दुनिया का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है.
भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT) कोटा के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र कच्छावा और उनकी टीम ने किसानों के लिए LS-CNN (Light Separable Convolutional Neural Network) आधारित एक हल्का, तेज और अत्याधुनिक AI मॉडल विकसित किया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह साधारण एंड्रॉयड स्मार्टफोन पर भी आसानी से काम करता है और कई परिस्थितियों में बिना इंटरनेट के भी फसलों की बीमारियों की पहचान कर सकता है.
खेतों की समस्या बनी दुनिया के लिए रिसर्च
इस इनोवेशन की शुरुआत किसी हाईटेक लैब से नहीं, बल्कि हाड़ौती के खेतों से हुई. कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़, दीगोद और भीलवाड़ा के बिगोद क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में दौरे के दौरान डॉ. कच्छावा ने देखा कि पत्तागोभी और सब्जी उत्पादक किसान फसलों की बीमारियों की सही पहचान नहीं कर पाने के कारण अनावश्यक और महंगे कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं. इससे न केवल किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा था बल्कि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा था.
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए उन्होंने अपनी टीम, कृषि वैज्ञानिकों और IIIT कोटा के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष डॉ. ज्ञान सिंह यादव के निर्देशन में व्यापक रिसर्च शुरू की. टीम ने 27 से अधिक खेतों से 1600 से ज्यादा संक्रमित और स्वस्थ पत्तियों की तस्वीरें एकत्र कीं. अलग-अलग मिट्टी, पानी और जलवायु परिस्थितियों में तैयार इस डेटा के आधार पर AI मॉडल को प्रशिक्षित किया गया.
7 बड़ी बीमारियां कुछ सेकंड में पहचान लेता है AI
फिलहाल यह तकनीक पत्तागोभी की फसल पर विकसित की गई है. यह अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट, ब्लैक रॉट, डाउनी मिल्ड्यू, बैक्टीरियल सॉफ्ट रॉट, फ्यूजेरियम येलो, बैक्टीरियल लीफ स्पॉट और क्लब रूट जैसी सात प्रमुख बीमारियों के साथ स्वस्थ पत्तियों की भी पहचान कर सकती है.
किसान को केवल संदिग्ध पत्ती की फोटो ऐप में अपलोड करनी होगी. AI पत्ती के रंग, आकार, धब्बों, रेशों और पैटर्न का विश्लेषण कर कुछ ही सेकंड में बीमारी की पहचान करेगा. इसके बाद ऐप बीमारी का कारण, वैज्ञानिक उपचार, उचित पेस्टिसाइड, उसकी मात्रा, छिड़काव का सही तरीका और आगे फसल का मैनेजमेंट भी बताएगा. ऐप बीमारी का पूरा रिकॉर्ड और हिस्ट्री भी सुरक्षित रखेगा.
95 प्रतिशत तक सटीकता, साधारण मोबाइल पर भी चलेगा
डॉ. कच्छावा के अनुसार इस AI मॉडल की टेस्टिंग पूरी हो चुकी है और इसमें करीब 95 प्रतिशत तक सटीकता प्राप्त हुई है. कम मेमोरी में तेज गति से काम करने वाले इस Lightweight मॉडल को विशेष रूप से किसानों के उपयोग को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है ताकि महंगे मोबाइल या हाई-स्पीड इंटरनेट की जरूरत न पड़े.
अब ड्रोन बताएगा खेत के किस हिस्से में बीमारी
रिसर्च का अगला चरण और भी आधुनिक है. फिलहाल ऐप एक फोटो से बीमारी पहचानता है, लेकिन भविष्य में इसे ड्रोन तकनीक से जोड़ा जाएगा. ड्रोन पूरे खेत की मैपिंग करेगा और AI यह बताएगा कि किस हिस्से में बीमारी फैली है. इसके बाद केवल संक्रमित क्षेत्र में ही दवा का छिड़काव किया जा सकेगा. इससे पेस्टिसाइड की खपत घटेगी, लागत कम होगी और पर्यावरण संरक्षण भी होगा.
पूरी तरह मुफ्त मिलेगा किसानों को
डॉ. राजेंद्र कच्छावा ने स्पष्ट किया कि इस तकनीक का उद्देश्य व्यवसाय नहीं बल्कि किसानों को राहत देना है. एंड्रॉयड ऐप अंतिम चरण में है और इसे किसानों के लिए पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध कराया जाएगा. आगे इसे iOS प्लेटफॉर्म पर भी लाने की योजना है.
अब टमाटर, मिर्च, आलू, गेहूं और सरसों की बारी
पत्तागोभी में सफलता मिलने के बाद अब इस तकनीक का दायरा तेजी से बढ़ाया जा रहा है. टीम टमाटर, मिर्च, आलू, लौकी, शिमला मिर्च, गेहूं, सरसों समेत कई अन्य फसलों की बीमारियों का डेटाबेस तैयार कर रही है. भविष्य में इसे कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से जोड़ा जाएगा, ताकि किसान सीधे विशेषज्ञों से संपर्क कर सकें और सलाह भी प्राप्त कर सकें.
किसानों की भाषा में करेगा बात
इस ऐप की एक और बड़ी खासियत यह है कि इसे पूरी तरह किसान-हितैषी बनाया जा रहा है. तकनीकी और कठिन शब्दों की जगह स्थानीय बोलचाल की भाषा का उपयोग किया जाएगा ताकि कम पढ़ा-लिखा किसान भी आसानी से इसका इस्तेमाल कर सके. भविष्य में इसे गुजराती, मराठी, उड़िया, तमिल, तेलुगु समेत कई भारतीय भाषाओं में भी उपलब्ध कराने की तैयारी है.
स्प्रिंगर नेचर में प्रकाशित हुआ शोध, नीदरलैंड से मिला विशेष निमंत्रण
IIIT कोटा की इस क्रांतिकारी रिसर्च को वैश्विक स्तर पर भी बड़ी पहचान मिली है. यह शोध दुनिया की प्रतिष्ठित रिसर्च पत्रिका Springer Nature में प्रकाशित हुआ है. इसके साथ ही डॉ. राजेंद्र कच्छावा को 21-22 अक्टूबर को नीदरलैंड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय ग्लोबल समिट में विशेष वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया है, जहां वे भारतीय AI तकनीक और कृषि नवाचार को विश्व मंच पर प्रस्तुत करेंगे.
यह उपलब्धि केवल IIIT कोटा या राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है. यह साबित करती है कि भारतीय वैज्ञानिक अब ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जो सीधे खेतों तक पहुंचकर किसानों की लागत घटाएगी, उत्पादन बढ़ाएगी, पर्यावरण की रक्षा करेगी और कृषि को डिजिटल युग की नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी.