बांग्लादेश ने भारत से हिल्सा मछली का आयात अचानक रोक दिया है. बांग्लादेश के मत्स्य विभाग ने भारतीय हिल्सा मंगाने की अनुमति देने वाले कम से कम 103 NOC (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) रद्द कर दिए हैं. ये NOC उन कारोबारियों को दिए गए थे, जो भारत के गुजरात से हिल्सा मंगाकर बांग्लादेश में बेच रहे थे.
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब हर साल दुर्गा पूजा से पहले बांग्लादेश से भारत को पद्मा हिल्सा भेजे जाने की उम्मीद रहती है. इस साल अभी तक बांग्लादेश ने भारत के लिए हिल्सा की कोई खेप घोषित नहीं की है. ऐसे में भारतीय बाजार में पसंद की जाने वाली पद्मा हिल्सा की सप्लाई को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ गई है.
बांग्लादेश दुनिया में हिल्सा का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश माना जाता है. वहां पद्मा नदी की हिल्सा को खास तौर पर प्रीमियम मछली माना जाता है. इसके मांस में ज्यादा फैट, नरमी और तेल में खास खुशबू होती है. दूसरी तरफ गुजरात के भरूच इलाके में नर्मदा नदी से मिलने वाली हिल्सा अपेक्षाकृत कम फैट वाली होती है. इसमें अंडे यानी रो ज्यादा होते हैं, जिसकी वजह से इसका स्वाद पद्मा हिल्सा की तुलना में कुछ कड़वा माना जाता है.
गुजरात से बांग्लादेश पहुंची 535 टन हिल्सा
पिछले सप्ताह बांग्लादेश ने पहली बार भारत से हिल्सा का आयात शुरू किया था. मछली कारोबारियों के मुताबिक इसका बड़ा हिस्सा गुजरात से आया और भरूच बंदरगाह के रास्ते भेजा गया.
भारत से यह मछली पेट्रापोल सीमा के जरिए बांग्लादेश के बेनापोल पहुंची. बांग्लादेश के एक अधिकारी के मुताबिक इस साल अब तक करीब 535 मीट्रिक टन भारतीय हिल्सा आयात की जा चुकी थी. NOC रद्द होने के बाद बेनापोल बाजार में इसकी सप्लाई भी रुक गई.
103 NOC क्यों रद्द किए गए?
23 सितंबर को बांग्लादेश के मत्स्य विभाग ने कम से कम 103 NOC वापस ले लिए. हालांकि विभाग ने आदेश में आयात रोकने की कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई है. बांग्लादेशी मीडिया में उद्योग से जुड़े लोगों के हवाले से इसके पीछे कई संभावित कारण बताए गए हैं. इनमें भारतीय हिल्सा को बांग्लादेश की स्थानीय या पद्मा हिल्सा बताकर बेचने से रोकना, कम कीमत दिखाकर कारोबार में गड़बड़ी रोकना और घरेलू हिल्सा उत्पादन को बढ़ावा देना शामिल है.
बांग्लादेश में हिल्सा का उत्पादन घटा
हिल्सा बांग्लादेश की सबसे महत्वपूर्ण मछलियों में से एक है, लेकिन वहां इसका उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में घटा है. रिपोर्टों के मुताबिक 2022 में हिल्सा का वार्षिक उत्पादन करीब 5.71 लाख टन था, जो 2025 में घटकर करीब 5 लाख टन रह गया.
उत्पादन घटने के साथ कीमतों में भी बड़ा इजाफा हुआ. 2018 में जहां हिल्सा की कीमत करीब 705 टका प्रति किलो थी, वहीं 25 अगस्त को यह 2,600 टका प्रति किलो तक पहुंच गई.
गुजरात की हिल्सा की मांग क्यों बढ़ी?
बांग्लादेश में भारतीय हिल्सा स्थानीय मछली की कमी को पूरा करने में मदद कर रही थी. इसकी कीमत पद्मा या मेघना की हिल्सा से कम रहती है. रिपोर्टों के मुताबिक प्रीमियम हिल्सा की कीमत करीब 2,800 टका प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि गुजरात की हिल्सा करीब 1,800 टका प्रति किलो तक मिलती है.
गुजरात की हिल्सा में ज्यादा रो होने के कारण इसकी मांग सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि मछली के अंडे निकालने के लिए भी है. इसके अलावा कम कीमत के कारण इसका इस्तेमाल नमकीन और धूप में सुखाई गई हिल्सा बनाने वाले कारोबारी भी करते हैं.
अब भारत को हिल्सा भेजने पर भी नजर
बांग्लादेश का भारतीय हिल्सा आयात रोकना ऐसे समय हुआ है, जब भारत में दुर्गा पूजा से पहले बांग्लादेशी पद्मा हिल्सा की मांग बढ़ती है. 2012 में बांग्लादेश ने भारत को हिल्सा निर्यात पर रोक लगा दी थी. इसके बाद दुर्गा पूजा के दौरान सीमित मात्रा में हिल्सा को विशेष अनुमति के तहत भारत भेजा जाता रहा है. 2025 में बांग्लादेश की तत्कालीन अंतरिम सरकार ने भारत को 1,200 टन हिल्सा भेजने की अनुमति दी थी. यह मात्रा 2024 के 2,420 टन से कम थी. हालांकि वास्तव में करीब 145 टन ही भारत पहुंच सकी थी.
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