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GDP... एक्साइज-कस्टम ड्यूटी... प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर... आसानी से समझना है बजट... तो इन भारी-भरकम शब्दों का जरूर जानें मतलब... वित्त मंत्री आज पेश करेंगी संसद में Budget

Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज सुबह 11:00 बजे संसद में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बजट पेश करेंगी. इस बजट को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मौजूदा कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण बजट माना जा रहा है. इस बजट से आम लोगों को बड़ी राहत की उम्मीद है. हम आपको बजट से जुड़े उन भारी-भरकम शब्दों का आसान मतलब बता रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आपको बजट समझने में आसानी होगी.

Budget 2026 Budget 2026

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) 1 फरवरी 2026 को सुबह 11:00 बजे संसद में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बजट (Budget) पेश करेंगी. इस बजट को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के तीसरे कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण बजट माना जा रहा है. इस बजट से आम लोगों को बड़ी राहत की उम्मीद है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस बजट को पेश करते ही लगातार नौवीं बार बजट प्रस्तुत करने वाली भारत की पहली वित्त मंत्री बन जाएंगी. आज हम आपको बजट से जुड़े उन भारी-भरकम शब्दों का आसान मतलब बता रहे हैं, जिन्हें पढ़कर आपको बजट समझने में आसानी होगी. सबसे पहले जानते हैं आखिर बजट क्या होता है.

क्या होता है बजट: फ्रांसीसी शब्द बौगेट से बजट शब्द की उत्पत्ति हुई है. बौगेट का अर्थ है चमड़े की अटैची. हम जैसे अपने घर का बजट बनाते हैं, वैसे ही सरकार पूरे देश का बनाती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 112 के नियम के मुताबिक सरकार बजट पेश करती है. यह बजट सरकार के एक साल के खर्चे और कमाई का पूरा हिसाब-किताब होता है. इसमें आसान भाषा में तीन मुख्य बातें होती हैं पहला सरकार हमसे टैक्स कितना लेगी, दूसरा विकास के कामों पर कितना पैसा खर्च करेगी और आने वाले समय के लिए उसकी नई योजनाएं क्या होंगी? एक वित्तीय वर्ष में कितनी आमदनी होगी, कितना खर्च होगा और बचत कितनी होगी, यह सब बजट में शामिल रहता है. बजट तीन प्रकार को होता है. पहला संतुलित बजट यानी बैलेंस्ड बजट, दूसरा अधिशेष या सरप्लस बजट और तीसरा घाटे वाला बजट यानी डेफिसिट बजट.

1. संतुलित बजट: एक वित्त वर्ष में जब सरकार की इनकम और खर्च के आंकड़े बराबर हों तो उसको संतुलित बजट यानी बैलेंस्ड बजट कहा जाता है.
2. सरप्लस बजट: एक वित्तीय वर्ष में जब अनुमानित आय अनुमानित व्यय से अधिक है तो बजट को अधिशेष या सरप्लस बजट कहा जाता है. इस प्रकार का बजट यह दर्शाता है कि सरकार की टैक्स से होने वाली आय, सरकार की ओर से पब्लिक वेलफेयर पर खर्च किए गए धन से अधिक है.
3. घाटे का बजट: बजट को घाटे वाला बजट यानी डेफिसिट बजट तब माना जाता है जब सरकार का अनुमानित खर्च उसकी राजस्व से प्राप्त आय से ज्यादा हो जाए.

वित्त विधेयक: Finance Bill यानी वित्त विधेयक के माध्यम से ही बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री सरकारी आमदनी बढ़ाने के विचार से नए करों आदि का प्रस्ताव करते हैं. वित्त विधेयक में मौजूदा कर प्रणाली में किसी तरह का संशोधन आदि को प्रस्तावित किया जाता है. संसद की मंजूरी मिलने के बाद ही इसे लागू किया जाता है. यूनियन बजट को पेश करने के तुरंत बाद वित्त विधेयक को पास किया जाता है.

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर: किसी व्यक्ति या संस्थान की आय पर जो टैक्स लगाया जाता है, उसे ही प्रत्यक्ष कर यानी डायरेक्ट टैक्स कहा जाता है. इसमें इनकम टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स और इनहेरिटेंस टैक्स शामिल हैं. अप्रत्यक्ष कर यानी इनडायरेक्ट टैक्स को वस्तुओं और सेवाओं पर लगाया जाता है. यह ऐसा टैक्स है, जिसको सीधे उपभोक्ता जमा नहीं करते हैं. उपभोक्ता इसका भुगतान तब करते हैं जब वे वस्तुएं और सेवाएं खरीदते हैं. इनमें उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क आदि शामिल हैं.

उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क: हमारे देश में निर्मित और घरेलू उपभोग के लिए बनाई गई वस्तुओं पर लगाया जाने वाला एक अप्रत्यक्ष कर उत्पाद शुल्क है. सीमा शुल्क देश में माल आयात या निर्यात किए जाने पर लगाए जाते हैं. इनका भुगतान आयातक या निर्यातक की ओर से किया जाता है. आम तौर पर इन्हें उपभोक्ता पर भी डाला जाता है.

राजकोषीय और प्राथमिक घाटा: सरकार की कुल आय और व्यय में अंतर (उधार को छोड़कर) को राजकोषीय घाटा कहा जाता है. इससे यह मालूम चलता है कि सरकार को कामकाज के लिए कितने उधार की जरूरत होगी. राजकोषीय घाटे की अवधारणा को नरसिम्हम समिति की सिफारिशों के बाद 1997-98 में बजट में पेश किया गया था. तब से राजकोषीय घाटा शासन का एक हिस्सा बन गया है. प्राथमिक घाटा राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान को घटाने पर मिलने वाला भाग है. यह बताता है कि सरकार की उधारी का कितना हिस्सा ब्याज भुगतान के अलावा अन्य व्ययों को पूरा करने में जा रहा है.

राजस्व घाटा: राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्ति के बीच के अंतर को राजस्व घाटा (रेवेन्यू डेफिसिट) कहा जाता है. यह सरकार की चालू प्राप्तियों की चालू व्यय से कमी को दर्शाता है. यह घाटा तब देखा जाता है जब राजस्व या व्यय की वास्तविक राशि बजट में बताए गए राजस्व या व्यय के अनुरूप नहीं होती है.

चालू खाता घाटा: देश में प्राप्त भुगतान और बाहरी देशों को चुकाई गई कीमत में जो अंतर आता है वह चालू खाता घाटा कहलाता है. जब देश की वस्तुओं, सेवाओं और ट्रांसफर का आयात इनके निर्यात से ज्यादा हो जाता है, तब चालू खाते घाटा की स्थिति पैदा होता है.

सरकारी राजस्व और व्यय: सरकार को सभी स्रोतों से होने वाली आमदनी को सरकारी राजस्व कहा जाता है. सरकार जिन-जिन मदों में खर्च करती है उसे सरकारी व्यय कहते हैं. यदि राजस्व प्राप्तियां राजस्व खर्च से अधिक हैं, तो यह अंतर राजस्व सरप्लस की श्रेणी में होगा.

राजकोषीय नीति: फिस्कल पॉलिसी यानी राजकोषीय नीति राजस्व और व्यय के समग्र स्तरों के संबंध में सरकार की तरफ से लिया गया एक्शन है. राजकोषीय नीति को बजट के जरिए लागू किया जाता है. इसके माध्यम से सरकार अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है.

बजट आकलन: संसद में बजट प्रस्ताव रखते हुए वित्तमंत्री विभिन्न तरह के कर और शुल्क के माध्यम से होने वाली आमदनी और योजनाओं के खर्चों का लेखा पेश करते हैं, उसे ही आमतौर पर बजट आकलन कहा जाता है.

GDP: ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट यानी जीडीपी (GDP) किसी भी देश में एक निश्चित अवधि के दौरान उत्पादित हुई सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य होता है. किसी देश में स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग मापने के लिए जीडीपी को पैमाना माना जाता है.

पूंजी बजट: इस बजट में सरकार को पूंजी प्राप्तियां और भुगतान शामिल होते हैं. इसमें सरकार की ओर से रिजर्व बैंक और विदेशी बैंक से लिए जाने वाले कर्ज, ट्रेजरी चालानों की बिक्री से होने वाली आय के साथ ही पूर्व में राज्यों को दिए गए कर्जों की वसूली से आए धन का हिसाब-किताब भी शामिल होता है.

मौद्रिक नीति: मॉनिट्री पॉलिसी यानी मौद्रिक नीति ऐसी प्रक्रिया है, जिसकी मदद से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित करता है. मौद्रिक नीति से कई मकसद साधे जाते हैं. इनमें महंगाई पर अंकुश, कीमतों में स्थिरता और टिकाऊ आर्थिक विकास दर का लक्ष्य हासिल करना शामिल है.

मुद्रास्फीति: मुद्रास्फीति का मतलब आम बोलचाल की भाषा में महंगाई से है. जब उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में स्थाई या अस्थाई बढ़ोतरी होती है तो उसे मुद्रास्फीति या महंगाई कहते हैं. मुद्रास्फीति वो स्टेज है, जिसमें मुद्रा की मूल्य गिरता है. इससे कीमतें बढ़ती रहती हैं.

विनियोग विधेयक: केंद्र सरकार को वित्तीय वर्ष के दौरान व्यय को पूरा करने के लिए समेकित निधि से धन निकालने की शक्ति विनियोग विधेयक देता है. विनियोग विधेयक का सीधा अर्थ यह है कि तमाम तरह के उपायों के बावजूद सरकारी खर्चे पूरे करने के लिए सरकार की कमाई नाकाफी है और सरकार को इस मद के खर्चे पूरे करने के लिए संचित निधि से धन की जरूरत है. वित्तमंत्री एक तरह से इस विधेयक के जरिए संसद से संचित निधि से धन निकालने की अनुमति मांगते हैं.

योजना और गैर योजना खर्च: योजना खर्च में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सहायता के अलावा केंद्र सरकार की योजनाओं पर होने वाले सभी तरह के खर्चों को शामिल किया जाता है. उधर, गैर योजना खर्च में ब्याज की रक्षा, सब्सिडी, अदायगी, डाक घाटा, पुलिस, पेंशन, आर्थिक सेवाएं, सार्वजनिक उपक्रमों को दिए जाने वाले कर्ज और राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और विदेशी सरकारों को दिए जाने वाले कर्ज शामिल होते हैं.

लेखानुदान: संसद की ओर से नए वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए अनुमानित व्यय के संबंध में अग्रिम रूप से दिया जाने वाला अनुदान को लेखानुदान कहते हैं, जो अनुदानों की मांग पर मतदान और विनियोग अधिनियम के पारित होने से संबंधित प्रक्रिया के पूरा होने तक लंबित रहता है.

विनिवेश (डिस्इनवेस्टमेंट): सरकार द्वारा पब्लिक सेक्टर की कंपनियों के शेयर बेचने को विनिवेश कहते हैं. सरकारी कंपनियों के जो शेयर सरकार के पास होते हैं, वे सरकार की संपत्ति होते हैं.

वस्तु एवं सेवा कर (GST): इसे 1 अप्रैल 2016 से लागू किया गया. अधिकांश इनडायरेक्ट टैक्स को इसके दायरे में समेट दिया गया. इनमें ऑक्ट्रॉय, सेंट्रल सेल्स टैक्स, स्टेट सेल्स टैक्स, एंट्री टैक्स, वैट, सर्विस टैक्स, वगैरह शामिल हैं. यह उत्पादन से लेकर अंतिम बिक्री तक हर चरण पर लगता है. लेकिन, कर केवल वैल्यू एडिशन पर लगाया जाता है. व्यवसायियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलता है.

शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स: स्टॉक, रियल एस्टेट, बॉन्ड, कमोडिटी आदि जैसी संपत्तियों की बिक्री पर प्राप्त किए लाभ इसमें शामिल होते हैं. सरकार इस पर टैक्स लगाती है. इसे शॉर्ट टर्म और लॉंग टर्म कैपिटल गेन टैक्स कहा जाता है. शॉर्ट टर्म की अविधि एक साल तक की होती है, जबकि उससे अधिक समय को लॉंग टर्म कहा जाता है. रियल एस्टेट के लिए दो साल की अवधि को लॉन्ग टर्म माना जाता है.

सार्वजनिक ऋण: सार्वजनिक ऋण कुल देनदारियों सहित बजट को पूरा करने के लिए सरकार द्वारा उधार ली गई कुल राशि है.

बजट अनुमान: यह एक रोडमैप है कि आने वाले साल में किस विभाग (जैसे शिक्षा या रक्षा) को कितना पैसा दिया जाएगा.

असेसी: हर वह व्यक्ति जो टैक्स देने के दायरे में आता है या जिस पर टैक्स की देनदारी बनती है.

टैक्स छूट: आपकी सैलरी या कमाई का वह हिस्सा जिस पर सरकार को एक रुपया भी टैक्स नहीं देना पड़ता.

कैपिटल एसेट्स और कैपिटल गेन्स:  कैपिटल एसेट्स में बिजनेस या निवेश के लिए खरीदी गई संपत्ति, जैसे शेयर, बॉन्ड या जमीन आती है. कैपिटल गेन्स में जब आप अपनी किसी संपत्ति (जैसे घर या शेयर) को बेचते हैं और उस पर जो मुनाफा होता है, उसे कैपिटल गेन कहा जाता है.