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भारत में घर, फ्लैट या जमीन खरीदना केवल एक निवेश नहीं होता. कुछ लोगों के लिए यह जीवनभर की कमाई और सपनों से जुड़ा फैसला होता है. लोग अक्सर प्रॉपर्टी की लोकेशन, कीमत और सुविधाओं के बारे में जानने में काफी समय खर्च करते हैं. लेकिन कई बार सबसे जरूरी चीज़, यानी कानूनी दस्तावेजों की जांच को नजरअंदाज कर देते हैं. यही छोटी सी गलती आगे चलकर बड़ी कानूनी परेशानी बन सकती है. जिसके चलते आर्थिक नुकसान और धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं. इसलिए किसी भी प्रॉपर्टी का सौदा फाइनल करने या एडवांस देने वाले हो तो पहले कुछ जरूरी डॉक्यूमेंट्स को जरूर चेक कर लें.
किसी भी प्रॉपर्टी की खरीदारी से पहले टाइटल डीड या सेल डीड की जांच करें. यह डॉक्यूमेंट साबित करता है कि प्रॉपर्टी का असली मालिक कौन है और उसे बेचने का कानूनी हक है या नहीं. खरीदार को यह पक्का करना चाहिए कि सेलर के पास इसकी ओरिजिनल कॉपी मौजूद हो और डॉक्यूमेंट अच्छी तरह से रजिस्टर्ड हों.
मदर डीड किसी प्रॉपर्टी का पूरा इतिहास बताती है. इसके जरिए यह पता चलता है कि सालों में प्रॉपर्टी किन-किन लोगों के पास रही और मौजूदा मालिक तक कैसे पहुंची. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि कम से कम पिछले 30 सालों तक का मालिकाना हक देखना चाहिए आगे चलकर कोई दूसरा व्यक्ति प्रॉपर्टी पर मालिकाना दावा न करने लगे.
एन्कम्ब्रेन्स सर्टिफिकेट (EC) यह जानकारी देता है कि प्रॉपर्टी पर कोई बैंक लोन या कानूनी देनदारी तो नहीं है. यदि प्रॉपर्टी पूरी तरह से लोन फ्री है, तो ‘Nil EC’ प्राप्त होता है.
यदि आप प्लॉट या जमीन खरीद रहे हैं, तो यह जांचना जरूरी है कि जमीन का इस्तेमाल किस कैटेगरी में आता है. कृषि भूमि को रेसिडेंशियल या इंडस्ट्रीयल उपयोग में बदलने के लिए कन्वर्जन सर्टिफिकेट जरूरी होता है. इसके बिना किया गया निर्माण फ्यूचर में कानूनी परेशानी खड़ी कर सकता है.
नए फ्लैट या बिल्डर प्रोजेक्ट में निवेश करते समय केवल पजेशन सर्टिफिकेट काफी नहीं होता. कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (CC) यह बताता है कि निर्माण पास हुए नक्शे के अनुसार पूरा हुआ है, जबकि ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) बताता है कि इमारत रहने के लिए सेफ और कानूनी रूप से मान्य है.