Yogi Adityanath
Yogi Adityanath
कल्पना कीजिए,जिस शहर में कभी सिर्फ चमड़े का काम या छोटे कारखाने हुआ करते थे, वहां अब मिसाइल और लड़ाकू जहाज़ों के पुर्जे बन रहे हैं. कभी भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में गिना जाता था. वैश्विक हथियार आयात में इसकी हिस्सेदारी करीब साढ़े नौ फीसदी तक पहुंच चुकी थी. आज वही तस्वीर बदलने की कोशिश हो रही है और इसका एक बड़ा केंद्र है उत्तर प्रदेश.
यही कहानी है उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (UPDIC) की. एक ऐसी योजना जो लखनऊ, कानपुर, झांसी, अलीगढ़, आगरा और चित्रकूट को भारत के रक्षा उत्पादन का नया इंजन बना रही है.
कैसे हुई शुरुआत?
2018-19 के केंद्रीय बजट में इस कॉरिडोर की घोषणा हुई थी. मकसद साफ था- भारत को हथियार और रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भर रहने की बजाय, खुद अपने देश में उन्हें बनाने लायक बनाना. इस पूरी परियोजना को ज़मीन पर उतारने की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (UPEIDA) को दी गई.
छह शहरों को इसके लिए चुना गया, ताकि रक्षा उत्पादन सिर्फ एक जगह सिमटा न रहे, बल्कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रोजगार और विकास पहुंचे. दिलचस्प बात यह है कि इस कॉरिडोर की असली शुरुआत भी एक भरोसेमंद कदम के साथ हुई थी. 11 अगस्त 2018 को अलीगढ़ में हुए एक निवेशक सम्मेलन में ही ₹3,700 करोड़ से ज़्यादा के निवेश की घोषणा हो गई थी.
अब तक कितना निवेश आया?
यह आंकड़ा हर महीने बढ़ रहा है. हाल की रिपोर्टों के मुताबिक, इस कॉरिडोर को अब तक करीब ₹35,000 करोड़ से ज्यादा के निवेश प्रस्ताव मिल चुके हैं और जून 2026 की एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा बढ़कर ₹39,571 करोड़ के पार भी बताया गया है. सरकार अब इसे बढ़ाकर आने वाले सालों में करीब ₹1 लाख करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रख रही है.
अब तक करीब 2,040 हेक्टेयर ज़मीन अधिग्रहीत की जा चुकी है, जिसमें से करीब 978 हेक्टेयर (आधे से थोड़ा कम) कंपनियों को आवंटित की जा चुकी है. कुल 62 कंपनियों को यहां जमीन मिल चुकी है, और इनमें से नौ इकाइयां पूरी तरह चालू भी हो चुकी हैं, जबकि 11 और के लिए लीज़ डील पर काम चल रहा है.
हर शहर की अपनी पहचान-
कानपुर- इस कॉरिडोर का सबसे बड़ा निवेश केंद्र है, जहां करीब ₹13,000 करोड़ के प्रोजेक्ट आ चुके हैं. यहां अडानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने करीब ₹1,500 करोड़ की लागत से दो बड़ी फैक्ट्रियां लगाई हैं, जो गोला-बारूद और मिसाइल बनाती हैं, इन्हें दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी निजी रक्षा निर्माण इकाइयों में गिना जाता है. ये दोनों फैक्ट्रियां फरवरी 2024 में शुरू हो चुकी हैं.
झांसी - इसे "गोला-बारूद और विस्फोटक केंद्र" के तौर पर विकसित किया जा रहा है, और यहां भी करीब ₹11,700 करोड़ का निवेश आ चुका है. यहां भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) अपनी नई यूनिट लगा रही है, जो रॉकेट प्रोपेलेंट और ग्रैड रॉकेट बनाएगी. इस नोड में 16 कंपनियों को 531 हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन आवंटित हो चुकी है, जहां विस्फोटक, प्रोपल्शन सिस्टम और इन्फैंट्री हथियारों के मोबाइल प्लेटफॉर्म बनाए जाएंगे.
लखनऊ- यहां की सबसे बड़ी पहचान है ब्रह्मोस एयरोस्पेस की फैक्ट्री, जिसमें करीब ₹300 करोड़ का निवेश हुआ है और जो सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल बनाती है. इसके अलावा एरोलॉय टेक्नोलॉजीज यहां टाइटेनियम की कास्टिंग बनाती है (करीब ₹320 करोड़ का निवेश), जो एयरोस्पेस के पुर्जों के लिए ज़रूरी होती है. कुल मिलाकर लखनऊ नोड में अब तक करीब ₹4,850 करोड़ का निवेश आ चुका है और यहां 12 से ज्यादा कंपनियां काम कर रही हैं.
अलीगढ़- यहां इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और ड्रोन बनाने का काम तेजी से बढ़ रहा है. अमिटेक इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियां यहां इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और सैटेलाइट सिस्टम बना रही हैं (करीब ₹330 करोड़ का निवेश), तो कुछ कंपनियां छोटे हथियार और सटीक पुर्जे बनाने में जुटी हैं. इस नोड में अब तक करीब ₹4,500 करोड़ के निवेश प्रस्ताव आ चुके हैं.
चित्रकूट- यहां भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) को करीब 75 हेक्टेयर ज़मीन दी गई है, जहां रडार और एयर डिफेंस सिस्टम बनाए जाएंगे. इस प्रोजेक्ट में BEL करीब ₹562 करोड़ का निवेश कर रही है.
आगरा- यह नोड अभी विकास के शुरुआती दौर में है, यहां ज़मीन आवंटन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम तेज़ी से चल रहा है.
कनेक्टिविटी है असली ताकत-
इस कॉरिडोर की एक बड़ी खूबी है इसकी कनेक्टिविटी. यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और आने वाला गंगा एक्सप्रेसवे. ये सभी छह नोड्स को आपस में जोड़ते हैं. इसका सीधा फायदा यह है कि कच्चा माल और तैयार सामान तेज़ी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंच पाता है, जिससे कंपनियों का समय और लागत दोनों बचती है.
आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है?
यह सिर्फ बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों और करोड़ों के आंकड़ों की कहानी नहीं है. इसका असली असर स्थानीय रोज़गार पर पड़ रहा है- इंजीनियर, टेक्नीशियन, मज़दूर और छोटे कारोबारियों तक, कानपुर और झांसी जैसे शहरों में नए मौके बन रहे हैं. साथ ही, HAL, BEL, BDL जैसी बड़ी सरकारी कंपनियों के साथ-साथ कई MSME भी इस कॉरिडोर से जुड़कर आगे बढ़ रहे हैं, जिससे सप्लाई चेन में छोटे उद्योगों को भी फायदा मिल रहा है.
एक वक्त था जब भारत रक्षा उपकरणों के मामले में दुनिया के सबसे बड़े आयातकों में गिना जाता था. अब उत्तर प्रदेश का यही कॉरिडोर उस तस्वीर को बदलने की कोशिश में जुटा है- धीरे-धीरे, मगर मज़बूती से.
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