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Nag Panchami Story & Significance: कैसे हुई थी धरती पर नागों की उत्पत्ति? जानें नाग पंचमी की पूरी पौराणिक कथा

कश्मीर के 'नीलमत पुराण' में 7वीं शताब्दी में नागों और सर्प पूजा का जिक्र मिलता है. इसके अलावा कल्हण की 'राजतरंगिणी' में भी सांपों का कश्मीरी इतिहास में मुख्य तौर पर जिक्र देखने को मिलता है. साथ ही महाभारत में भी सांपों की भूमिका देखने को मिलती है. नाग पंचमी नाग देवता की पूजा और उनसे सुख-शांति की कामना का पर्व है. पौराणिक मान्यता के अनुसार नागों की उत्पत्ति कश्यप और कद्रू से हुई थी. आइए जानते हैं पूरी ऐतिहासिक कहानी.

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नाग पंचमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. सावन के महीने में आने वाला यह पर्व भगवान शिव और नाग देवता से जुड़ी आस्था के कारण खास माना जाता है. इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है और उनसे परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है. नाग पंचमी सावन के माह में दो बार आता है. कुछ लोग कृष्ण पक्ष की पंचमी को इस त्योहार को मनाते हैं, तो कुछ शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर धरती पर नागों की उत्पत्ति कैसे हुई और नाग पंचमी मनाने की शुरुआत क्यों हुई? इसके पीछे पुराणों में कई रोचक कथाएं मिलती हैं. इन्हीं में से एक कथा राजा जन्मेजय और आस्तिक मुनि से जुड़ी है.

कैसे हुई नागों की उत्पत्ति?
पौराणिक मान्यता के अनुसार नागों की उत्पत्ति प्रजापति कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से हुई थी. कद्रू ने हजार नाग पुत्रों की इच्छा जताई थी. इसके बाद उनके गर्भ से अनेक नागों का जन्म हुआ. इन्हीं में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और पद्म जैसे प्रमुख नागों का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है. नागों का संबंध सिर्फ धरती से ही नहीं, बल्कि देवताओं और भगवान विष्णु व भगवान शिव से भी जोड़ा जाता है. शेषनाग को भगवान विष्णु की शय्या के रूप में बताया गया है, जबकि भगवान शिव के गले में नाग वासुकि विराजमान रहते हैं. यही वजह है कि हिंदू धर्म में नागों को सामान्य जीव के रूप में ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था से जुड़े रूप में भी देखा जाता है.

नाग पंचमी पर क्यों होती है नागों की पूजा?
नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है. धार्मिक मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से उनका आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. नाग पंचमी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथाओं में आस्तिक मुनि की कथा भी शामिल है. पौराणिक कथा के अनुसार राजा जन्मेजय के पिता परीक्षित की मौत नागराज तक्षक के डसने से हुई थी. इसके बाद गुस्से में जन्मेजय ने सभी नागों को खत्म करने के लिए सर्प यज्ञ शुरू किया. यज्ञ में नाग खिंचकर अग्नि में गिरने लगे. इसी दौरान आस्तिक मुनि वहां पहुंचे. उन्होंने अपनी बातों से राजा जन्मेजय को प्रभावित किया. राजा ने उन्हें वर मांगने को कहा. आस्तिक मुनि ने सर्प यज्ञ रोकने का वर मांग लिया. राजा ने अपना वचन निभाया और यज्ञ रोक दिया. इस तरह आस्तिक मुनि ने नागों का संहार रुकवाकर उनकी जान बचाई. कब से नागों की पूजा का चलन चलने लगा.

एक और मान्यता कृषि और खेती से जुड़ी है. इस पर्व का एक संबंध प्रकृति और खेती से भी है. सांप खेतों में रहने वाले चूहों और कई तरह के कीटों को खाते हैं. इससे फसल को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों की संख्या कम होती है और किसानों की खेती को फायदा मिलता है. यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में सांपों को खेतों का रक्षक भी माना जाता रहा है.

राजा जन्मेजय ने क्यों किया था सर्प यज्ञ?
महाभारत के अनुसार, राजा परीक्षित पांडवों के वंशज और अभिमन्यु के पुत्र थे. उनके शासनकाल में ही कलियुग का प्रभाव धरती पर बढ़ने लगा था. कथा के अनुसार राजा परीक्षित एक दिन शिकार के लिए निकले थे. रास्ते में उन्हें एक स्थान पर कलियुग दिखाई दिया. राजा ने उसे अपने राज्य में रहने की अनुमति नहीं दी. हालांकि बाद में उन्होंने उसे कुछ स्थानों पर रहने की अनुमति दी, जिसमें सोना, मदिरापान, अनैतिक संबंध, हिंसा, और जुआ जैसे स्थान शामिल थे. इसके बाद एक दिन राजा परीक्षित शिकार करने निकले और वह आश्रम पहुंचे. वहां ऋषि शमीक ध्यान में लीन थे. राजा ने उनसे कुछ पूछा, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जवाब नहीं दिया. 

चूंकि राजा ने सोने का मुकुट पहन रखा था, जिससे कलियुग उनके बुद्धि पर भी हावी हो गया. ऋषि के जबाव न देने पर राजा ने अपना अपमान समझ लिया और क्रोध में ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया. लेकिन जब राजा ने मुकुट उतारा तो उन्हें अपनी गलती का ज्ञात हुआ. जब तक राजा परीक्षित होते तो कलियुग का आगमन नहीं हो सकता था, इसलिए कलियुग ने राजा की बुद्धि पर भ्रम डाला.

ऋषि के पुत्र ने दिया राजा को श्राप
जब ऋषि शमीक के पुत्र श्रृंगी ऋषि को इस घटना का आभास हुआ तो उन्हें बहुत क्रोध आया. उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया कि सातवें दिन नागराज तक्षक के डसने से उनकी मृत्यु हो जाएगी. श्राप की जानकारी मिलने के बाद राजा परीक्षित ने खुद को बचाने के लिए कई सावधानियां बरतीं. लेकिन सातवें दिन नागराज तक्षक ने उन्हें डस लिया और राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई.

राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय को जब पिता की मौत की जानकारी मिली तो वह बेहद दुखी और क्रोधित हुए. उन्होंने नागराज तक्षक को अपने पिता की मौत का जिम्मेदार माना और नागों से बदला लेने का फैसला किया. इसी बदले की भावना में राजा जन्मेजय ने सर्प यज्ञ शुरू करवाया. यज्ञ में विशेष मंत्रों का जाप किया गया, जिसके प्रभाव से बड़ी संख्या में नाग खिंचकर यज्ञ की अग्नि में गिरने लगे.
 

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