Renu Hans
Renu Hans
जम्मू के लोअर रूपनगर स्थित माइग्रेंट फ्लैट्स में रहने वाली रेनू हंस ने 22 साल के लंबे अंतराल के बाद दोबारा पढ़ाई शुरू कर अपनी मेहनत और हौसले की मिसाल पेश की है. जम्मू-कश्मीर स्टेट ओपन स्कूलिंग (JKSOS) की परीक्षा में रेनू ने 500 में से 406 अंक हासिल कर 82 प्रतिशत अंक प्राप्त किए.
22 साल बाद पढ़ाई में लौटी रेनू हंस-
रेनू के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है, क्योंकि वह सुनने और बोलने में असमर्थ हैं. उनके पति भी सुनने और बोलने में असमर्थ हैं. इसके बावजूद रेनू ने अपनी परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और 22 साल बाद दोबारा शिक्षा से जुड़ने का फैसला किया.
फैमिली को सरकार से मिलती है आर्थिक मदद-
रेनू कश्मीरी पंडित परिवार से ताल्लुक रखती हैं और जम्मू के लोअर रूपनगर में स्थित माइग्रेंट फ्लैट्स में रहती हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य है. घर की आजीविका मुख्य रूप से उनके पिता बंसी लाल हंस, जो टेलरिंग का काम करते हैं, की कमाई से चलती है. परिवार को सरकार की ओर से मिलने वाली राहत भी उनके लिए आर्थिक सहारा है.
मां की उपलब्धि पर बेटे को खुशी-
रेनू की पढ़ाई दोबारा शुरू करने के फैसले में परिवार ने उनका पूरा साथ दिया. खासतौर पर उनके बेटे नमन कौल ने उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया. नमन खुद 12वीं कक्षा में पढ़ रहा है और अपनी मां की इस उपलब्धि को लेकर बेहद खुश है.
मां पर गर्व है- बेटा
गुड न्यूज टुडे से बातचीत में नमन कौल ने बताया कि अब वह अपनी मां को कंप्यूटर की जानकारी देना चाहता है. साथ ही उसका लक्ष्य है कि वह अपनी मां को आगे 12वीं कक्षा की पढ़ाई के लिए भी तैयार करवाए.
नमन का कहना है कि उसकी मां ने जिस हिम्मत के साथ 22 साल बाद दोबारा पढ़ाई शुरू की और 82 प्रतिशत अंक हासिल किए, वह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात है.
रेनू ने फैमिली को दिया श्रेय-
रेनू अपनी सफलता का श्रेय अपने परिवार के सहयोग और माता-पिता के आशीर्वाद को देती हैं. उनके पिता बंसी लाल हंस और मां दर्शना देवी ने उनके जीवन में हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया.
JKSOS के माध्यम से रेनू को लंबे अंतराल के बाद अपनी शिक्षा दोबारा जारी रखने का अवसर मिला. उन्होंने इस अवसर का पूरा लाभ उठाते हुए मेहनत की और शानदार परिणाम हासिल किया.
महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं रेनू-
रेनू हंस की उपलब्धि केवल 82 प्रतिशत अंक हासिल करने तक सीमित नहीं है. यह उन महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए प्रेरणा है जो परिस्थितियों के कारण अपनी पढ़ाई या सपनों को बीच में छोड़ देते हैं.
रेनू ने साबित किया है कि पढ़ाई के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनती और अगर हौसला मजबूत हो तो वर्षों बाद भी नई शुरुआत की जा सकती है. उनकी कहानी परिवार के सहयोग, माता-पिता के आशीर्वाद और एक बेटे के उस विश्वास की मिसाल है, जो अब अपनी मां की शिक्षा को आगे बढ़ाने का सपना देख रहा है.
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