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नई पीढ़ी और बुजुर्गों के बीच बढ़ती दूरी आज पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है. पर जालौर जिले के रेवत और कलापुरा गांवों की तस्वीर एकदम अलग है. यहां बच्चे न केवल अपने बुजुर्गों के करीब जा रहे हैं, बल्कि उनसे अपने गांव का सदियों पुराना इतिहास भी दर्ज कर रहे हैं.
बुजुर्गों से बात करने का हॉमवर्क
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, रेवत के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के टीचर संदीप जोशी ने इस अनोखी पहल की शुरुआत 2018 में की. उन्होंने ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को दिवाली और गर्मी की छुट्टियों में पारंपरिक होमवर्क देने की बजाय यह काम सौंपा कि वे गांव के बुजुर्गों के पास बैठें, उनसे कहानियां और अनुभव सुनें, फिर उन्हें अपनी कॉपियों में लिखें. छात्र इन कहानियों को ऑडियो-वीडियो के रूप में भी रिकॉर्ड करते हैं. बाद में स्कूल में सभी डायरियां मिलाकर कॉमन कहानियों को एक बड़ी पोथी में संकलित किया जाता है.
300 बच्चे जुड़े इस पहल से
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले आठ सालों में लगभग 300 बच्चे इस पहल से जुड़कर अपने क्षेत्र का इतिहास लिख चुके हैं. इनमें हजार साल पुरानी दिलचस्प जानकारियां सामने आई हैं. खास बात यह है कि जब बच्चे और बुजुर्ग मिलकर किस्से-कहानियां साझा करते हैं तो दोनों के चेहरों पर मुस्कान आ जाती है. इससे पीढ़ियों के बीच की दूरी घट रही है और आपसी जुड़ाव बढ़ रहा है.
प्रिंसिपल छगनपुरी गोस्वामी के अनुसार इस प्रयास का सीधा असर बच्चों के प्रदर्शन पर भी हुआ है. पहले जहां इतिहास विषय में विद्यार्थी 60–70% अंक पाते थे, वहीं अब कई बच्चे 100% अंक ला रहे हैं. साथ ही, उन्हें अपने शासकों, वंशजों, जातियों और व्यापार के बारे में गहरी समझ मिल रही है.
रेवत और कलापुरा के बच्चों की यह अनोखी पहल न सिर्फ स्थानीय इतिहास को संरक्षित कर रही है, बल्कि तीन पीढ़ियों के बीच आत्मीयता का पुल भी बना रही है.
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