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बिहार राज्यसभा चुनाव, पवन सिंह और नितिन नवीन को लेकर अटकलें तेज

बिहार की 5 राज्यसभा सीटों को लेकर सूबे की सियासत में कयासबाजी तेज हो गई है. 16 मार्च को होने वाले चुनाव में बीजेपी किसको उम्मीदवार बना सकती है. राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन और पवन सिंह को लेकर है.

Nitin Nabin and Pawan Singh Nitin Nabin and Pawan Singh

चुनाव आयोग ने बिहार की 5 राज्यसभा सीटों सहित देश की 37 सीटों पर चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है. बिहार में 26 फरवरी को अधिसूचना जारी होगी, जिसके बाद 16 मार्च को मतदान और उसी दिन शाम को मतगणना की जाएगी. 9 अप्रैल को कार्यकाल पूरा करने वाले सांसदों में जेडीयू के हरिवंश नारायण सिंह, रामनाथ ठाकुर, राजद के अमरेंद्र धारी सिंह, प्रेमचंद गुप्ता और उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं.

सीटों का गणित और समीकरण-
बिहार विधानसभा के मौजूदा संख्या बल के आधार पर एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है. आंकड़ों के लिहाज से सत्ताधारी एनडीए का पलड़ा भारी नजर आ रहा है. बीजेपी और जेडीयू के खाते में 2-2 सीटें जाना लगभग तय माना जा रहा है. वहीं, विपक्ष (महाठबंधन) के पास केवल एक उम्मीदवार को सदन भेजने की ताकत बची है, जिसके लिए राजद और कांग्रेस को आपसी सहमति बनानी होगी.

नितिन नवीन और पवन सिंह पर टिकी नजरें-
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन को लेकर है. उन्हें दिल्ली में हाल ही में टाइप-8 बंगला आवंटित किया गया है, जो आमतौर पर सांसदों या कैबिनेट मंत्रियों को मिलता है. 

चूंकि वे अभी बिहार में विधायक हैं, इसलिए कयास लगाए जा रहे थे कि वे राज्यसभा जा सकते हैं, लेकिन संगठन में उनकी नई जिम्मेदारी को देखते हुए अब उनके उच्च सदन जाने की संभावना कम दिख रही है.

दूसरी ओर भोजपुरी स्टार पवन सिंह को लेकर सस्पेंस बरकरार है. विधानसभा चुनाव में बीजेपी के लिए किए गए धुआंधार प्रचार के इनाम के तौर पर पार्टी उन्हें राज्यसभा भेज सकती है. मनोज तिवारी के बयानों ने इन चर्चाओं को और हवा दी है.

जेडीयू और कुशवाहा की चुनौती-
जेडीयू कोटे से हरिवंश नारायण सिंह और रामनाथ ठाकुर के रिपीट होने पर संशय है, क्योंकि नीतीश कुमार आमतौर पर दो से अधिक कार्यकाल नहीं देते. वहीं, उपेंद्र कुशवाहा के लिए राह कठिन दिख रही है. उनके बेटे के मंत्री बनने के बाद, 'परिवारवाद' के आरोपों से बचने के लिए बीजेपी उन्हें दोबारा मौका देने से परहेज कर सकती है. कुल मिलाकर, यह चुनाव बिहार की भविष्य की राजनीति और 2030 तक राज्यसभा में विपक्षी दलों की उपस्थिति तय करने वाला साबित होगा.

(हिमांशु मिश्रा की रिपोर्ट)

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