पाकीज़ा का 4K वर्जन प्रीमियर के लिए तैयार
पाकीज़ा का 4K वर्जन प्रीमियर के लिए तैयार
हिंदी सिनेमा के इतिहास में जब भी उन अदाकाराओं का जिक्र होता है, जिन्होंने पर्दे पर अभिनय को एक अलग मुकाम दिया, तो मीना कुमारी का नाम बेहद खास अंदाज में लिया जाता है. उनकी आंखों की उदासी, चेहरे के भाव और बोलने का अंदाज ऐसा था कि किरदार सिर्फ पर्दे पर नजर नहीं आता था, बल्कि सीधे दर्शकों के दिल में उतर जाता था. मीना कुमारी ने अपने अभिनय से ऐसी पहचान बनाई, जिसे हिंदी सिनेमा आज भी याद करता है.
इसी महान अदाकारा की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल 'पाकीज़ा' अब एक बार फिर बड़े पर्दे पर लौटने जा रही है. कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी 1972 की यह क्लासिक फिल्म अब 4K रिस्टोर्ड वर्जन में दिखाई जाएगी. फिल्म का रिस्टोरेशन फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन (FHF) ने किया है. इसे दो साल की मेहनत के बाद तैयार किया गया है. इसका वर्ल्ड प्रीमियर फ्रांस के ल्योन में होने वाले फेस्टिवल लुमिएर में होगा और इसके बाद फिल्म बीएफआई लंदन फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाएगी.
ल्योन से लंदन तक होगा 'पाकीज़ा' का सफर
'पाकीज़ा' का वर्ल्ड प्रीमियर ल्योन में फेस्टिवल लुमिएर में होगा. इस प्रीमियर की अगुवाई कान्स और लुमिएर फेस्टिवल के प्रमुख थियरी फ्रेमॉ करेंगे. ल्योन के बाद फिल्म लंदन पहुंचेगी, जहां बीएफआई आईमैक्स में इसका गाला स्क्रीनिंग होगा. इसे फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन के निदेशक शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर, कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही, बेटी रुखसार अमरोही और पोते बिलाल अमरोही के साथ पेश करेंगे.
दो साल में दोबारा संवरी फिल्म की तस्वीर
'पाकीज़ा' को 4K में वापस लाना आसान काम नहीं था. रिस्टोरेशन के दौरान जब फिल्म के ओरिजिनल कैमरा निगेटिव की जांच की गई तो वह लगभग पिघल चुका था और इस्तेमाल करने की हालत में नहीं था. दूसरे फिल्म एलीमेंट्स में भी रंग फीके पड़ चुके थे और स्क्रैच, मोल्ड जैसी कई दिक्कतें थीं. ऐसे में टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती कमाल अमरोही की उस विजुअल कल्पना को दोबारा पर्दे पर उतारना था, जो फिल्म के हर फ्रेम में नजर आती है.
पुराने निगेटिव की जगह इन चीजों से हुआ रिस्टोरेशन
मूल कैमरा निगेटिव उपलब्ध न होने के बावजूद रिस्टोरेशन का काम रुका नहीं. टीम को फिल्म की एक इंटरपॉजिटिव कॉपी मिली, जिसे फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन ने संरक्षित किया था. इसके अलावा एनएफडीसी-नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया के पास मौजूद कलर रिवर्सल इंटरनेगेटिव का भी इस्तेमाल किया गया.
रिस्टोरेशन के दौरान रंगों की एकरूपता बनाए रखना बड़ी चुनौती थी. टीम को फिल्म की शूटिंग के ओरिजिनल स्टिल्स भी मिले, जिनसे पुराने रंगों और फ्रेम की बारीकियों को समझने में मदद मिली. ताजदार और रुखसार अमरोही से भी लगातार सलाह ली गई, क्योंकि दोनों शूटिंग के दौरान सेट पर मौजूद रहे थे और उन्हें फिल्म के बनने से जुड़ी कई बातें याद थीं.
मीना कुमारी के कपड़ों का रंग भी यादों से तय हुआ
रिस्टोरेशन में छोटी-छोटी चीजों का भी खास ध्यान रखा गया. मसलन, 'इन्हीं लोगों ने' गाने के दौरान मीना कुमारी की पोशाक का सही रंग तय करने के लिए रुखसार अमरोही को तस्वीरें बार-बार दिखाई गईं. कोशिश यही थी कि 4K वर्जन में फिल्म का रंग और रूप कमाल अमरोही की मूल सोच के जितना करीब हो सके, उतना रखा जाए. फिल्म की आवाज को भी 5.1 साउंड में रिस्टोर किया गया है. इसके लिए साउंड निगेटिव और रिलीज प्रिंट का इस्तेमाल किया गया.
बचपन से 'पाकीज़ा' से जुड़ा था शिवेंद्र डूंगरपुर का रिश्ता
शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर के लिए यह सिर्फ एक फिल्म का रिस्टोरेशन नहीं था. उन्होंने बताया कि बचपन में बिहार के डुमरांव के एक सिनेमा हॉल में उन्होंने अपनी दादी के साथ पहली बार 'पाकीज़ा' देखी थी. तभी से इस फिल्म को रिस्टोर करना उनका सपना रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि जब उन्होंने ओरिजिनल कैमरा निगेटिव की हालत देखी तो उनका दिल बैठ गया था. उनके सामने खराब फिल्म एलीमेंट्स थे, लेकिन उनकी यादों में 'पाकीज़ा' का हर फ्रेम रंगों, भव्य सेट और मीना कुमारी की खूबसूरती से भरा हुआ था.
जब फिल्म की रील पालकी में पहुंची थी
'पाकीज़ा' से जुड़ी यादें सिर्फ रिस्टोरेशन टीम के लिए ही खास नहीं हैं. कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही ने 1972 के ग्रैंड प्रीमियर को याद करते हुए बताया कि वह अपने पिता और 'छोटी अम्मी' यानी मीना कुमारी के साथ वहां मौजूद थे. उन्होंने बताया कि फिल्म के डिब्बे मराठा मंदिर तक पालकी में लाए गए थे. अब 54 साल बाद वही ताजदार अपने परिवार के साथ 'पाकीज़ा' के रिस्टोर्ड वर्जन को लंदन के गाला प्रीमियर में पेश करेंगे.
'पाकीज़ा' के इर्द-गिर्द घूमती थी कमाल अमरोही की जिंदगी
ताजदार अमरोही के मुताबिक, बचपन में उन्होंने अपने पिता को इस फिल्म में पूरी तरह डूबे हुए देखा था. कमाल अमरोही ने 'पाकीज़ा' में अपनी पूरी ताकत और पैसा लगा दिया था. फिल्म उनके लिए सिर्फ एक कहानी नहीं थी, बल्कि उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना थी.
ताजदार ने बताया कि बचपन में जब वह या उनके भाई-बहन किसी चीज की मांग करते थे तो उनके पिता का जवाब होता था- 'पाकीज़ा के बाद.' उन्होंने कहा कि उनके पिता ने इस फिल्म को 15 साल से ज्यादा समय तक एक बच्चे की तरह पाला और हर मुश्किल के बावजूद इसे पूरा करने में लगे रहे.
रुखसार बोलीं- मीना कुमारी के बिना 'पाकीज़ा' की कल्पना नहीं
रुखसार अमरोही ने 'पाकीज़ा' को अपने पिता का जुनून, सपना और ऑक्सीजन बताया. उनके मुताबिक इस फिल्म में मीना कुमारी की जगह कोई और नहीं ले सकता था. उनके लिए मीना कुमारी ही 'पाकीज़ा' थीं. फिल्म में मीना कुमारी ने साहिबजान का किरदार निभाया था, जिसे आज भी उनके सबसे यादगार और भावनात्मक किरदारों में गिना जाता है. बीएफआई भी फिल्म को भारतीय सिनेमा के आखिरी महान शास्त्रीय संगीतप्रधान फिल्मों में से एक और मीना कुमारी के बेहद चर्चित अभिनय वाली फिल्म के तौर पर पेश कर रहा है.
1950 के दशक में शुरू हुई थी 'पाकीज़ा' की कहानी
'पाकीज़ा' का सफर 1950 के दशक के बीच में शुरू हुआ था. कमाल अमरोही ने इसे अपनी पत्नी और प्रेरणा मीना कुमारी की खूबसूरती को ध्यान में रखते हुए शुरू किया था. फिल्म की शूटिंग 1956 में ब्लैक एंड व्हाइट में शुरू हुई और 1958 में इसे ईस्टमैनकलर में शूट करने का फैसला किया गया. इसकी शुरुआती सिनेमैटोग्राफी मशहूर जर्मन सिनेमैटोग्राफर जोसेफ विर्शिंग ने की थी.
फिल्म को पर्दे तक पहुंचने में करीब 15 साल लगे. इस दौरान शूटिंग रुकती-चलती रही, कलाकारों में बदलाव हुए, लोकेशन और स्क्रिप्ट को लेकर काम होता रहा और एक स्टूडियो में लगी आग में ब्लैक एंड व्हाइट वर्जन के ओरिजिनल निगेटिव का कुछ हिस्सा भी खो गया.
पर्दे की कहानी से कम नहीं था फिल्म बनने का सफर
दिवंगत फिल्म समीक्षक डेरेक मैल्कम ने 'पाकीज़ा' को सिनेमा के सबसे असाधारण म्यूजिकल मेलोड्रामाज में से एक बताया था. फिल्म की कहानी जितनी भावनाओं, मोहब्बत और दर्द से भरी थी, उसके बनने का सफर भी उतना ही उतार-चढ़ाव वाला रहा. 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई 'पाकीज़ा' बाद में भारतीय सिनेमा की यादगार फिल्मों में शामिल हो गई. अब 54 साल बाद इसका 4K रूप एक बार फिर दर्शकों को उस दौर की भव्यता, संगीत और मीना कुमारी की अदाकारी से रूबरू कराने जा रहा है.
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