उत्तर मध्य रेलवे (NCR) ने दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. रेलवे ने अब तक करीब 400 दिव्यांग लोगों को विभिन्न संविदा (कॉन्ट्रैक्चुअल) पदों पर रोजगार उपलब्ध कराया है. इस पहल का उद्देश्य सिर्फ नौकरी देना नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाना भी है. उत्तर मध्य रेलवे की ओर से दिव्यांगजनों को स्टेशन अनाउंसर, ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन (ATVM) ऑपरेटर, डेटा एंट्री ऑपरेटर, वन स्टेशन वन प्रोडक्ट (OSOP) स्टॉल ऑपरेटर और ग्राहक सेवा से जुड़े अन्य पदों पर नियुक्त किया गया है. इन पदों के जरिए दिव्यांगजन रेलवे की विभिन्न सेवाओं का हिस्सा बनकर अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं.
तीनों मंडलों में हुई नियुक्तियां
अब तक हुई करीब 400 संविदा नियुक्तियों में सबसे ज्यादा रोजगार प्रयागराज मंडल में दिया गया है, जहां 200 दिव्यांगजनों को मौका मिला. इसके अलावा झांसी मंडल में 100 और आगरा मंडल में 63 दिव्यांगजनों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया गया है. रेलवे का कहना है कि आगे भी जहां आवश्यकता होगी, वहां ऐसे अवसर बढ़ाए जाएंगे.
जनरल मैनेजर के निर्देश के बाद शुरू हुआ अभियान
उत्तर मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिवम शर्मा ने बताया कि इस वर्ष की शुरुआत में महाप्रबंधक एन.पी. सिंह ने प्रयागराज, झांसी और आगरा मंडलों को निर्देश दिए थे कि जहां भी संभव हो, दिव्यांगजनों के लिए रोजगार के अवसर तैयार किए जाएं. इसी निर्देश के बाद तीनों मंडलों में बड़े स्तर पर संविदा के आधार पर नियुक्तियां की गईं. रेलवे केवल रोजगार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने पर भी विशेष ध्यान दे रहा है. इसी उद्देश्य से रेलवे ने अपनी अप्रेंटिसशिप योजना के तहत 100 दिव्यांगजनों को कौशल प्रशिक्षण (स्किल ट्रेनिंग) भी दी है, ताकि वे भविष्य में बेहतर रोजगार के अवसर हासिल कर सकें.
वर्कशॉप और प्रोडक्शन यूनिट में भी अवसर
रेलवे अधिकारियों के अनुसार यह पहल केवल प्रयागराज, झांसी और आगरा मंडलों तक सीमित नहीं है. झांसी स्थित वर्कशॉप और प्रोडक्शन यूनिट्स में भी दिव्यांगजनों के लिए रोजगार के अवसर विकसित किए गए हैं. वहीं उत्तर मध्य रेलवे में वर्तमान समय में 784 दिव्यांग कर्मचारी नियमित सेवा में कार्यरत हैं. इनमें 2025-26 के दौरान नियुक्त किए गए 15 नए दिव्यांग कर्मचारी भी शामिल हैं. रेलवे का मानना है कि इस तरह की पहल से अधिक से अधिक दिव्यांगजन आत्मनिर्भर बन सकेंगे और समाज की मुख्यधारा में मजबूती से अपनी भूमिका निभा सकेंगे.
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