
International Stress Awareness Week
International Stress Awareness Week
क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि छुट्टी के दिन सोफे पर आराम कर रहे हैं, लेकिन दिमाग में ऑफिस के काम, अधूरी डेडलाइन और अगले दिन की मीटिंग घूमती रहती है? फोन पर बार-बार ईमेल चेक करने का मन करता है और काम न करने पर गिल्ट होने लगता है. अगर ऐसा है तो आप अकेले नहीं हैं. साइकोलॉजी में इस स्थिति को 'स्ट्रेसलैक्सिंग' (Stresslaxing) कहा जाता है.
कई लोगों के लिए छुट्टी का मतलब सिर्फ ऑफिस न जाना रह गया है. शरीर तो घर पर होता है, लेकिन दिमाग अब भी काम में उलझा रहता है. कभी लगता है कि कोई जरूरी मेल छूट न जाए, तो कभी अधूरे काम याद आने लगते हैं. कुछ लोग आराम करते हुए भी बेचैन रहते हैं और बार-बार खुद को याद दिलाते हैं कि उन्हें कुछ जरूरी काम करना चाहिए.
International Stress Awareness Week के मौके पर समझते हैं कि आखिर आराम करते समय भी तनाव क्यों महसूस होता है, छुट्टी में काम की चिंता दिमाग पर क्यों हावी रहती है और इससे बाहर निकलने के लिए क्या किया जा सकता है.
इस बारे में हमने बात की सीनियर साइकियाट्रिस्ट और CEO डॉ. गौरव गुप्ता से और स्ट्रेसलैक्सिंग से जुड़े कुछ अहम सवालों के जवाब जानने की कोशिश की.
क्या होता है स्ट्रेसलैक्सिंग?
स्ट्रेसलैक्सिंग दो शब्दों से मिलकर बना है- स्ट्रेस (तनाव) और रिलैक्सिंग (आराम करना). इसका मतलब है कि जब कोई व्यक्ति आराम करने की कोशिश करता है, लेकिन उस दौरान भी उसे तनाव या बेचैनी महसूस होती है.
मसलन, रविवार को आपकी छुट्टी है. आपने तय किया कि आज कोई काम नहीं करेंगे और पूरा दिन आराम करेंगे. लेकिन कुछ देर बाद ही दिमाग में सोमवार की मीटिंग, अधूरी रिपोर्ट और बॉस के मैसेज आने लगते हैं. आपको लगता है कि इतना समय खाली बैठने के बजाय कुछ काम कर लेना चाहिए.
ऐसे में शरीर आराम कर रहा होता है, लेकिन दिमाग लगातार सक्रिय रहता है. न तो व्यक्ति ठीक से काम कर पाता है और न ही छुट्टी का आनंद ले पाता है. यही स्थिति स्ट्रेसलैक्सिंग कहलाती है.
आराम करते समय भी तनाव क्यों होने लगता है?
डॉ. गौरव गुप्ता के मुताबिक, इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं. सबसे बड़ी वजह है जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं का लगातार दिमाग में बने रहना. जब किसी व्यक्ति के ऊपर काम का दबाव, समयसीमा और निजी जिम्मेदारियां होती हैं, तो वह काम खत्म होने के बाद भी उनसे मानसिक रूप से अलग नहीं हो पाता.
इसके अलावा, आज के समय में कई लोग अपनी पहचान और सफलता को काम से जोड़कर देखते हैं. उन्हें लगता है कि जितना ज्यादा काम करेंगे, उतने ही सफल होंगे. धीरे-धीरे यह सोच बन जाती है कि खाली बैठना या आराम करना समय बर्बाद करने जैसा है. ऐसे में छुट्टी मिलने पर भी व्यक्ति का मन शांत नहीं हो पाता. उसे लगता है कि कहीं वह दूसरों से पीछे तो नहीं छूट रहा.

छुट्टी में भी ऑफिस के ईमेल बार-बार क्यों चेक करते हैं?
आज स्मार्टफोन और इंटरनेट ने काम को घर तक पहुंचा दिया है. पहले ऑफिस से निकलने के बाद काम खत्म हो जाता था, लेकिन अब ईमेल, व्हाट्सऐप और दूसरे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए व्यक्ति हर समय काम से जुड़ा रहता है. छुट्टी के दिन भी फोन पर नोटिफिकेशन आते रहते हैं. कई लोगों को डर रहता है कि कहीं कोई जरूरी जानकारी छूट न जाए या बॉस का मैसेज अनदेखा न रह जाए.
इसके पीछे कुछ प्रमुख वजहें हैं-
कुछ छूट जाने का डर: लोगों को लगता है कि ऑफिस का कोई जरूरी अपडेट उनसे छूट सकता है.
काम की छवि खराब होने की चिंता: कुछ कर्मचारियों को डर रहता है कि समय पर जवाब नहीं देने से उन्हें गैर-जिम्मेदार समझा जाएगा.
हर चीज पर नियंत्रण रखने की आदत: कुछ लोग चाहते हैं कि ऑफिस में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी उन्हें हर समय रहे.
डिजिटल आदत: बार-बार फोन चेक करने की आदत इतनी बढ़ जाती है कि छुट्टी में भी हाथ अपने आप फोन की तरफ चला जाता है.
स्ट्रेसलैक्सिंग और बर्नआउट में क्या अंतर है?
इन तीनों स्थितियों में तनाव महसूस हो सकता है, लेकिन इनके अर्थ अलग-अलग हैं.
1. स्ट्रेसलैक्सिंग (Stresslaxing): इसमें व्यक्ति आराम करना चाहता है, लेकिन आराम के दौरान भी बेचैनी, अपराधबोध या काम से जुड़े विचार आते रहते हैं. उसे छुट्टी का आनंद लेने में परेशानी होती है.
2. वर्क रिलेटेड एंग्जाइटी (Work-related Anxiety): इसमें काम, डेडलाइन, नौकरी की सुरक्षा, प्रदर्शन और जिम्मेदारियों को लेकर लगातार चिंता बनी रहती है. व्यक्ति को अक्सर यह डर रहता है कि कहीं उससे कोई गलती न हो जाए या काम उम्मीद के मुताबिक न हो पाए.
3. बर्नआउट (Burnout): यह लंबे समय तक काम के दबाव और तनाव में रहने से पैदा होने वाली शारीरिक और मानसिक थकान की स्थिति है. इसमें व्यक्ति को लगातार थकान, काम के प्रति अरुचि, चिड़चिड़ापन और अपनी कार्यक्षमता में गिरावट महसूस हो सकती है.
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