James Harrison (Photo: Facebook/Thanking James Harrison)
James Harrison (Photo: Facebook/Thanking James Harrison)
कुछ लोग दुनिया से जाकर भी नहीं जाते हैं क्योंकि उनके काम ऐसे होते हैं कि वे लाखों लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं. आज ऐसे ही एक शख्स के बारे में हम आपको बता रहे हैं. यह कहानी है ऑस्ट्रेलिया के जेम्स हैरिसन की जो सिर्फ अपने देश के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल हैं. जेम्स हैरिसन को "मैन विद द गोल्डन आर्म" के नाम से जाना जाता है. 17 फरवरी 2025 को जेम्स हैरिसन ने दुनिया को अलविदा कहा.
ऑस्ट्रेलियाई रेड क्रॉस संगठन लाइफब्लड के अनुसार, जेम्स हैरिसन उनका नींद में ही निधन हो गया. जेम्स हैरिसन के प्लाज्मा ने लाखों नवजात शिशुओं की जान बचाई. बीबीसी के अनुसार, हैरिसन के प्लाज्मा में एक दुर्लभ एंटीबॉडी थी- एंटी-डी. इसका इस्तेमाल गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली खास दवा बनाने के लिए किया जाता है.
क्या है एंटी-डी इंजेक्शन
एंटी-डी इंजेक्शन एक जीवन रक्षक दवा है जो RhD-निगेटिव मांओं को दी जाती है. RhD-निगेटिव मामलों में मां का रक्त उनकेगर्भ में पल रहे बच्चे के लिए घातक हो सकता है. अगर उन्हें यह इंजेक्शन न दिया जाए तो भ्रूण और नवजात शिशु को हेमोलिटिक रोग हो सकता है. इसलिए गर्भवती महिला को समय रहते ही एंटी-डी इंजेक्शन दिया जाता है. जेम्स के प्लाज्मा डोनेशन की वजह से 24 लाख नवजात शिशुओं को ज़िंदगी मिली.
18 से 81 साल की उम्र तक किया रक्तदान
लाइफब्लड के मुताबिक, हैरिसन की 14 साल की उम्र में फेफड़ों की सर्जरी हुई थी और तब उन्हें रक्त चढ़ाया गया था. इसके बाद उन्होंने समाज को कुछ वापस देने का फैसला किया. उन्होंने 18 साल की उम्र में रक्तदान करना शुरू किया और 81 साल की उम्र तक रक्तदान करना जारी रखा. अपनी ज़िंदगी में, उन्होंने 1,000 से अधिक बार रक्तदान किया है.
हैरिसन की बेटी ट्रेसी मेलोशिप ने एक बयान में रेड क्रॉस को बताया, "उन्हें बिना किसी लागत या दर्द के इतने सारे लोगों की जान बचाने पर बहुत गर्व था." हैरिसन को यह जानकर खुशी होती थी कि उनकी वजह से आज बहुत से परिवार ज़िंदगी जी रहे हैं. उनकी खुद की बेटी को प्रेग्नेंसी में एंटी-डी इंजेक्शन की जरूरत पड़ी थी.
अनजान लोगों की करते रहे मदद
ऑस्ट्रेलियन रेड क्रॉस लाइफब्लड के सीईओ स्टीफन कॉर्नेलिसन का कहना है कि हैरिसन ने ऐसे लोगों की मदद की, जिन्हें वह जानते भी नहीं थे. उन्होंने कभी भी ब्लड डोनेट करना बंद नहीं किया. चाहे कितना भी मुश्किल हो लेकिन वह ब्लड डोनेट जरूर करते थे. और अब वह दुनिया के लिए एक बड़ी विरासत अपने पीछे छोड़कर गए हैं.
रेड क्रॉस का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया में एंटी-डी डोनर्स की कमी है. देशभर में 200 से भी कम एंटी-डी डोनर हैं, जो हर साल लगभग 45,000 मांओं और उनके बच्चों की मदद करते हैं. हैरिसन के डोनेशन से मिली 20 लाख डोज के अलावा, लैब्स में अभी भी हैरिसन का ब्लड मौजूद है.
'जेम्स इन ए जार'
हैरिसन और दूसरे डोनर्स के ब्लड का इस्तेमाल करके ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक एक लैब में एंटी-डी एंटीबॉडी विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं. इस प्रक्रिया को रेड क्रॉस ने "जेम्स इन ए जार" नाम दिया है. उन्हें उम्मीद है कि अगर यह प्रयास सफल हो जाता है तो दुनियाभर में अनगिनत परिवारों की मदद की जा सकेगी.