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Expert Talk: क्या है थायराइड और कब बनती है ये बीमारी, महिलाओं को गर्भधारण में आती है परेशानी, ये हैं 7 रिस्क फैक्टर्स

थायराइड की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब तक इसका पता नहीं चलता, तब तक यह शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. लेकिन एक बार डायग्नोसिस हो जाए, तो दवाओं और लाइफस्टाइल बदलाव से इसे आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है.

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हाइलाइट्स
  • फर्टिलिटी पर थायराइड का सीधा असर

  • क्या है थायराइड और क्यों है इतना जरूरी

जनवरी को पूरी दुनिया में 'थायराइड अवेयरनेस मंथ' के रूप में मनाया जाता है. इसका मकसद लोगों को थायराइड ग्रंथि के महत्व और इससे जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूक करना है. भारत में स्थिति चिंताजनक है. अनुमान के मुताबिक, देश में करीब 5 करोड़ लोग थायराइड की समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को इसका पता ही नहीं चल पाता. हालांकि समय पर जांच और इलाज से इस बीमारी को आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है.

क्या है थायराइड और क्यों है इतना जरूरी
थायराइड गर्दन के सामने मौजूद एक छोटी-सी ग्रंथि है, लेकिन इसका असर पूरी बॉडी पर पड़ता है. यह ग्रंथि ऐसे हार्मोन रिलीज करती है, जो ब्लड प्रेशर, दिल की धड़कन, मेटाबॉलिज्म, वजन, सेक्स ड्राइव, पीरियड्स, प्रेग्नेंसी और यहां तक कि मूड को भी कंट्रोल करते हैं. शरीर की लगभग हर छोटी-बड़ी प्रक्रिया किसी न किसी रूप में थायराइड हार्मोन पर निर्भर करती है.

कब बनती है थायराइड बीमारी
समस्या तब शुरू होती है, जब थायराइड ग्लैंड जरूरत से कम (हाइपोथायराइड) या ज्यादा (हाइपरथायराइड) हार्मोन बनाने लगता है. इसी असंतुलन को थायराइड डिसऑर्डर कहा जाता है.
शुरुआत में इसके लक्षण हल्के होते हैं, इसलिए लोगों को पता ही नहीं चलता लेकिन समय के साथ यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है.

फर्टिलिटी पर थायराइड का सीधा असर
इस बीमारी को लेकर GNT ने मैक्स हॉस्पिटल, गुरुग्राम की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. टीना सिंह से बात की और इस बीमारी से जुड़े कुछ सवाल किए.

डॉ. टीना के मुताबिक, थायराइड का सीधा संबंध फर्टिलिटी से है. थायराइड असंतुलन से महिलाओं में पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं, ओव्यूलेशन प्रभावित होता है और कंसीव करने में दिक्कत आती है. पुरुषों में भी थायराइड गड़बड़ी से स्पर्म की क्वालिटी और काउंट पर असर पड़ सकता है.

डॉ. सिंह बताती हैं कि हाई TSH लेवल अक्सर हाई प्रोलैक्टिन लेवल से जुड़ा होता है, जिससे गर्भाशय की परत पतली हो जाती है. इसका नतीजा इम्प्लांटेशन फेलियर के रूप में सामने आता है, चाहे प्रेग्नेंसी नेचुरल हो या IVF.

समय पर इलाज से संभव है हेल्दी प्रेग्नेंसी
थायराइड का समय पर पता चल जाए तो इलाज आसान है. सही दवाओं और नियमित जांच से फर्टिलिटी बेहतर हो सकती है और हेल्दी प्रेग्नेंसी की संभावना बढ़ जाती है. इसलिए गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं को थायराइड टेस्ट जरूर कराना चाहिए.

थायराइड बढ़ने के 7 बड़े रिस्क फैक्टर
1. हार्मोनल असंतुलन: जब शरीर जरूरत से ज्यादा या कम थायराइड हार्मोन बनाता है, तो मेटाबॉलिज्म और दूसरे फंक्शंस बिगड़ जाते हैं.

2. जेंडर और उम्र: महिलाओं में थायराइड की समस्या पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा होती है, खासकर 40 साल की उम्र के बाद.

3. प्रेग्नेंसी और मेनोपॉज: इन दोनों ही स्थितियों में हार्मोनल बदलाव तेजी से होते हैं, जो थायराइड की समस्या को ट्रिगर कर सकते हैं.

4. फैमिली हिस्ट्री: अगर परिवार में किसी को थायराइड है, तो अगली पीढ़ी में इसका खतरा बढ़ जाता है.

5. कम उम्र और स्ट्रेस: आजकल कम उम्र के लोगों में भी थायराइड देखा जा रहा है. लगातार तनाव और स्मोकिंग थायराइड नोड्यूल्स और हार्मोन बैलेंस को प्रभावित करते हैं.

6. कुछ दवाइयां: लंबे समय तक ली जाने वाली कुछ दवाएं, जैसे लिथियम  और कुछ हार्ट की दवाएं, थायराइड फंक्शन को बिगाड़ सकती हैं.

7. प्रोसेस्ड और शुगर वाले फूड: ज्यादा प्रोसेस्ड और मीठा खाना थायराइड नोड्यूल्स में सूजन बढ़ा सकता है, जिससे ग्रंथि सही तरीके से काम नहीं कर पाती.

इलाज आसान, बस पहचान जरूरी
थायराइड की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जब तक इसका पता नहीं चलता, तब तक यह शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. लेकिन एक बार डायग्नोसिस हो जाए, तो दवाओं और लाइफस्टाइल बदलाव से इसे आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है.