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32 साल से नहीं बजाया एक भी बार हॉर्न, इस शख्स का मोटो है ‘यूज ब्रेक, नॉट हॉर्न्स’

कैलाश का मानना है कि हॉर्न बजाने से आक्रामकता बढ़ती है, जिससे तनाव होता है और फिर उससे दिल की समस्या हो सकती है. वे कहते हैं, "जब मैंने अपनी पीठ पर पोस्टर लगाना शुरू किया तो मेरी बेटियों ने कहा कि लोग मुझे पागल कहेंगे. तब से मैं शहर में एक भी दिन बिना पोस्टर लगाए नहीं निकला.”

Don't Honk, use brakes Don't Honk, use brakes
हाइलाइट्स
  • कैलाश का मानना है कि हॉर्न बजाने से तनाव होता है

  • हॉर्न न बजाएं, ब्रेक लगाएं

जरा सोचिये आप बिना हॉर्न का इस्तेमाल किये कितने दिन कोई भी वाहन चला सकते हैं? एक दिन.....दो दिन… तीन दिन….लेकिन एक शख्स हैं जिन्होंने 32 सालों से एक भी बार हॉर्न नहीं बजाया है. कैलाश मोहता नाम के व्यक्ति हॉर्निंग के अनावश्यक उपयोग के सख्त खिलाफ हैं.

बड़ाबाजार में औजारों के व्यापारी कैलाश मोहता ने पिछले 32 वर्षों में न केवल कोलकाता की सड़कों पर भीड़ के बीच ड्राइविंग करते हुए, एक भी बार हॉर्न नहीं बजाया है. केवल हॉर्न न बजाना ही नहीं, बल्कि उन्होंने अपनी पीठ पर और अपने स्कूटर पर भी एक पोस्टर लगाया हुआ है, जिसमें उन्होंने ‘नो हॉन्किंग’ का पोस्टर भी लगाया है. 

हॉर्न न बजाएं, ब्रेक लगाएं 

मोहता का मानना है कि बगैर हॉर्न न बजाएं और केवल ट्रैफिक नियमों का पालन करने से ही यातायात सुगम हो सकता है. वे कहते हैं, “क्या हॉर्न बजाने से यातायात सुगम होगा? नहीं. इसे ट्रैफिक नियमों का पालन करके हल किया जा सकता है. हॉर्न न बजाएं, ब्रेक लगाएं.”
मोहता की मानें तो, अगर मोटर चालक हॉर्न न बजाएं, तो इससे उनका शहर कई अधिक सभ्य और रहने योग्य हो जायेगा. मोहता खुद को 'मौन समाज सुधारक” मानते हैं.

उन्होंने ये मिशन क्यों शुरू किया?

जब उनसे पूछा कि उन्होंने ये मिशन क्यों शुरू किया तो उन्होंने बताया, “मैं अमेरिका में रहा हूं, चीन की लंबी यात्रा की है, जो बहुत अधिक आबादी वाली जगह हैं. क्या वे अनावश्यक रूप से हॉर्न बजाते हैं? नहीं. अगर ये देश कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं?" 

मोहता ने आगे बताया कि जब उन्होंने 2017 में शुरुआत की थी तो उनके परिवार ने उनका काफी सपोर्ट किया. जब लोगों ने उनके काम की सराहना करना शुरू किया, तो उनके परिवार को इसपर काफी गर्व महसूस हुआ.

कैलाश का मानना है कि हॉर्न बजाने से आक्रामकता बढ़ती है, जिससे तनाव होता है और फिर उससे दिल की समस्या हो सकती है. वे कहते हैं, "जब मैंने अपनी पीठ पर पोस्टर लगाना शुरू किया तो मेरी बेटियों ने कहा कि लोग मुझे पागल कहेंगे. तब से मैं शहर में एक भी दिन बिना पोस्टर लगाए नहीं निकला.”

(सूर्याग्नि रॉय की रिपोर्ट)

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