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हौसला हो तो ऐसा, जन्म से अंधे युवक ने नहीं मानी हार, मेहनत कर बना पोस्ट मास्टर, पिता लकवाग्रस्त और मां भी दृष्टिहीन

पोस्ट ऑफिस की कुर्सी पर बैठे शम्भूलाल को देखकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि वे सामान्य युवक नहीं हैं. वे रोजाना आने वाले ग्राहकों का काम पूरी लगन से करते हैं, उनकी समस्याएं सुनते हैं और समाधान भी निकालते हैं.

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जीवन में मुश्किलें अक्सर लोगों को तोड़ देती हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हालात से हार नहीं मानते और अपने मजबूत इरादों से नई मिसाल कायम करते हैं. ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है आगर मालवा जिले के ग्राम महुड़िया निवासी शम्भूलाल विश्वकर्मा की. जन्म से अंधे होने के बावजूद उन्होंने ना सिर्फ अपनी कमजोरियों को मात दी, बल्कि आज पोस्ट मास्टर बनकर जिम्मेदारी से लोगों की सेवा कर रहे हैं.

जन्म से ही दिव्यांग हैं शम्भूलाल
पोस्ट ऑफिस की कुर्सी पर बैठे शम्भूलाल को देखकर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि वे सामान्य युवक नहीं हैं. वे रोजाना आने वाले ग्राहकों का काम पूरी लगन से करते हैं, उनकी समस्याएं सुनते हैं और समाधान भी निकालते हैं. दरअसल, भगवान ने उन्हें जन्म से ही आंखों की रोशनी नहीं दी. उन्हें केवल एक-दो इंच की दूरी तक ही दिखाई देता है, लेकिन इसी के सहारे वे पोस्ट ऑफिस के सभी काम संभाल लेते हैं.

मोबाइल चलाना हो, लॉगिन करना हो या पासवर्ड डालना, शम्भूलाल ये सभी काम बेहद आसानी से कर लेते हैं. उनकी कार्यक्षमता देखकर हर कोई हैरान रह जाता है.

बेहद गरीबी में गुजरा शम्भूलाल का बचपन
राजस्थान बॉर्डर पर बसे महुड़िया गांव में पले-बढ़े शम्भूलाल का बचपन बेहद गरीबी में गुजरा. उनके पिता लकवाग्रस्त हैं और लंबे समय से बिस्तर पर ही हैं, जबकि उनकी मां भी जन्म से दिव्यांग हैं. घर की कठिन परिस्थितियों के बावजूद शम्भूलाल ने कभी हिम्मत नहीं हारी. जब भी उन्हें समय मिलता है, वे पिता के पास बैठकर उनका हौसला बढ़ाते हैं और मां के कामों में भी हाथ बंटाते हैं.

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दसवीं की परीक्षा में 87% अंक हासिल किए
शम्भूलाल ने शुरुआती पढ़ाई गांव में की, लेकिन परिवार की हालत सुधारने के लिए उन्होंने जिला मुख्यालय जाकर आगे पढ़ने का फैसला किया. पहले जिस स्कूल में दाखिला लिया, वहां उनकी जरूरतों के अनुरूप पढ़ाई नहीं थी. इसके बाद उन्होंने आगर मालवा के एक निजी स्कूल में प्रवेश लिया और वहीं से बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी की. उनकी मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने दसवीं की परीक्षा में 87% अंक हासिल किए.

टीचर की वजह से हुआ चयन
स्कूल के एक शिक्षक से उन्हें पता चला कि ब्लाइंड उम्मीदवारों के लिए पोस्ट ऑफिस में वैकेंसी निकली है. उन्होंने तुरंत आवेदन किया और चयनित भी हो गए. नौकरी के दौरान, जिले से बाहर रहते हुए सहयोगियों की मदद से उनका विवाह एक गरीब परिवार की लड़की से हुआ. अब उनके घर एक छोटा बच्चा भी है, जिसके साथ वे समय बिताते हैं और पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभाते हैं.

रिपोर्ट- प्रमोद