Akhilesh Yadav and Asaduddin Owaisi
Akhilesh Yadav and Asaduddin Owaisi
यूपी में अगले साल यानी 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं लेकिन अभी से उत्तर प्रदेश में सियासी पारा चढ़ा हुआ है. इस चुनाव में तो मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा में है लेकिन अन्य दल भी चुनाव प्रचार में जी-जान से लगे हुए हैं. इस समय यूपी में मुस्लिम वोटों पर सियासी घमासान छिड़ा हुआ है. अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (SP) और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMM) आमने-सामने हैं. दलों दलों के प्रमुख मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने में लगे हुए हैं. अखिलेश यादव असदुद्दीन ओवैसी को लेकर लागतार बोलने से बचते रहे हैं लेकिन अब अखिलेश ने ओवैसी पर बिना नाम लिए सिलसिलेवार तरीके से वार किया है और AIMM को ओटीपी से चलने वाली प्रीपेड पार्टी बता दिया.
अखिलेश यादव बोले- हमें प्रीपेड पार्टियों से भी सावधान रहना पड़ेगा
अखिलेश यादव ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा हमें प्रीपेड पार्टियों से भी सावधान रहना पड़ेगा, उन दलों और नेताओं से सावधान रहना पड़ेगा, जिनका ओटीपी कहीं और से आता है केवल सोशल मीडिया के हैंडल ही दूसरों के पास हैं बल्कि माइक भी वो उसी दल के बन गए हैं, लाउडस्पीकर बनकर जा रहे हैं. माइक और लाउडस्पीकर किसी और का बनकर आए हैं, सच्चाई ये है कि डोरी खत्म खेल खत्म. बाबा रामदेव के ओवैसी को लेकर दिए बयान पर भी अखिलेश यादव ने पलटवार किया और कहा सच्चाई तो यही है कि जितनी ढील दोगे, ढील से उड़ती है सब चीजें, डोरी खत्म खेल खत्म, बात तो ये है चरखी किसके हाथों में है सवाल ये है.
...तो सपा का बिगड़ सकता है गणित
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘डोरी खत्म, खेल खत्म’ का बयान देकर अखिलेश ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए जो ‘रिमोट’ राजनीतिक दल मैदान में उतर रहे हैं, उनका खेल जनता 2027 में पूरी तरह समाप्त कर देगी. ओवैसी पश्चिम यूपी (मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर) और पूर्वांचल (आज़मगढ़, मऊ) की चुनिंदा सीटों पर भी 10 से 15 हजार वोट काटने में कामयाब हो गए, तो कड़े मुकाबले वाली सीटों पर सपा का गणित बिगड़ सकता है. ओवैसी के आने से जहां एक तरफ मुस्लिम नेतृत्व की नई बहस छिड़ गई है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी को भी ध्रुवीकरण की पिच पर खेलने का एक और मौका मिल जाता है. कुल मिलाकर, 2027 के रण से पहले ओवैसी की आक्रामक एंट्री और अखिलेश यादव के तीखे तेवर यह साफ बयां करते हैं कि इस बार का चुनाव सिर्फ बीजेपी बनाम सपा नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर नेतृत्व की सर्वोच्चता हासिल करने का भी एक कड़ा संघर्ष बन चुका है.