Rahul Gandhi and Akhilesh Yadav seat sharing
Rahul Gandhi and Akhilesh Yadav seat sharing
अगर राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान फोटो खिंचवाने के मौके (फोटो-ऑप्स) पर्दे के पीछे की स्थिति का कोई संकेत हैं, तो मंगलवार को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इंडिया (I.N.D.I.A.) गठबंधन के प्रदर्शन ने यह संदेश दिया कि उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए सपा-कांग्रेस गठबंधन अभी पूरी तरह से तय नहीं हुआ है.
राहुल के साथ कदम तो मिले, लेकिन पहले जैसी दिखी नहीं नजदीकी
हालांकि, सपा प्रमुख अखिलेश यादव राहुल गांधी की अगुवाई में हुए इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए मंगलवार सुबह दिल्ली पहुंचे, लेकिन दोनों नेताओं के बीच पहले जैसी गर्मजोशी न दिखने से फोटोग्राफर निराश रहे. जब राहुल गांधी ने विरोध मार्च का नेतृत्व किया, तो अखिलेश अपने सांसदों के साथ उनके एक पंक्ति पीछे चलना पसंद करते दिखे. राहुल और अखिलेश दोनों ही विरोध मार्च में एक साथ तो थे, लेकिन उस तरह 'साथ' नहीं दिखे जैसा वे पहले 'जेन ज़ेड' (Gen Z) प्रदर्शन, 'भारत जोड़ो यात्रा' और 'यूपी के लड़के' अभियान के दौरान नजर आते थे.
लखनऊ में नामांकन के चलते दिल्ली नहीं पहुंचे अखिलेश
बात सिर्फ मंगलवार के प्रदर्शन की ही नहीं है. 30 सितंबर को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में अखिलेश के शामिल न होने पर भी सवाल उठे थे, क्योंकि वे सपा प्रत्याशी रामगोपाल यादव और रिलायंस समूह के अध्यक्ष धनराज परिमल नथवानी के राज्यसभा चुनाव नामांकन पत्र दाखिल कराने के सिलसिले में लखनऊ में ही रुके रहे. अखिलेश द्वारा दिल्ली बैठक के लिए सांसद हरेंद्र मलिक और मोहिबुल्लाह नदवी को भेजा जाना, और धर्मेंद्र यादव या डिंपल यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं को न भेजना भी लोगों की नजरों से बच नहीं पाया.
इस बार कांग्रेस ने खुद पर फोकस रखने की रणनीति अपनाई?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, शायद कांग्रेस भी अखिलेश और उनकी सांसद पत्नी डिंपल यादव को अगली पंक्तियों में देखने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं थी, क्योंकि जुलाई में संसद तक 'जेन ज़ेड' नीट (NEET) पेपर लीक विरोध मार्च के दौरान इस दंपति ने सारी सुर्खियां बटोर ली थीं. उस प्रदर्शन के दौरान घायल जेन ज़ेड प्रदर्शनकारियों की देखभाल करतीं डिंपल यादव और अखिलेश यादव को हिरासत में लिए जाने के विरोध में दिल्ली में लगे घंटों लंबे ट्रैफिक जाम ने सारा ध्यान खींच लिया था. शायद कांग्रेस खुद इस बार पूरा मीडिया फोकस अपने ऊपर चाहती थी, इसलिए उन्होंने इस मार्च की रूपरेखा इसी तरह तैयार की.
वोटबैंक ने थाम रखा सपा-कांग्रेस का हाथ
राजनीतिक विश्लेषकों का सामान्य रूप से मानना है कि सपा और कांग्रेस दोनों ही गठबंधन के प्रति प्रतिबद्ध दिखना चाहते हैं, क्योंकि दोनों का वोट-बैंक यही चाहता है कि दोनों पार्टियां एक साथ आएं और 2024 के लोकसभा चुनावों जैसा जादू दोहराएं. ऐसे माहौल में, चुनाव नतीजे अगर भाजपा के पक्ष में जाते हैं, तो जिस भी पार्टी की ओर से कमी दिखेगी, जनता उसे ही इस नाकामी का जिम्मेदार ठहराएगी. कोई भी दल इसका ठीकरा अपने सिर नहीं फोड़ना चाहता, और शायद यही वह मजबूरी है जिसने दोनों को बांधकर रखा हुआ है. अगर मतदाताओं का यह दबाव न होता, तो यह बात काफी पहले ही बिगड़ चुकी होती.
यूपी की राजनीति के गलियारों में, राहुल गांधी का मुख्य भूमिका निभाना और अखिलेश का केंद्र से नदारद रहना सपा-कांग्रेस संबंधों में तनाव का एक और संकेत माना जा रहा है. यह खिंचाव तब से अधिक दिख रहा है जब से कांग्रेस के कई पदाधिकारी गठबंधन की संभावनाओं पर 'अनावश्यक बयानबाजी' कर रहे हैं, जबकि सपा इस मुद्दे पर सधी हुई चुप्पी साधे हुए है.
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