Athora Durga Puja
Athora Durga Puja
दुर्गापूजा यानी चार दिनों का उत्सव... लेकिन पश्चिम बंगाल के आसनसोल में एक ऐसी दुर्गापूजा है, जहां देवी की आराधना सिर्फ चार दिनों तक नहीं होती. यहां मुख्य दुर्गापूजा से करीब 15 दिन पहले ही पूजा शुरू हो जाती है और हर दिन मां को चावल यानी भात का भोग लगाया जाता है. करीब 700 साल पुरानी इस पूजा में आज भी ताड़पत्र की पांडुलिपि से मंत्र पढ़े जाते हैं, एकचाला प्रतिमा बनाई जाती है और संधि पूजा के बाद बंदूक की आवाज से बलि की शुरुआत का संकेत दिया जाता है.
आसनसोल के एथोरा गांव की 'बड़ी दुर्गा' की कहानी
आसनसोल के एथोरा गांव में करीब 700 साल पुरानी यह दुर्गापूजा आज भी अपनी सदियों पुरानी परंपराओं के साथ जारी है. चक्रवर्ती और मुखोपाध्याय परिवार की इस पूजा को स्थानीय लोग 'बड़ी दुर्गा की पूजा' के नाम से जानते हैं. यहां दुर्गापूजा का मतलब सिर्फ चार दिनों का उत्सव नहीं है. मुख्य दुर्गापूजा से करीब 14-15 दिन पहले ही देवी की पूजा शुरू हो जाती है. कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि से देवी का कल्पारंभ और बोधन किया जाता है. इसके बाद हर दिन मां की पूजा होती है और रोजाना चावल यानी भात का भोग लगाया जाता है. यानी जिस समय बाकी जगहों पर दुर्गापूजा की तैयारियां शुरू होती हैं, उस समय एथोरा की बड़ी दुर्गा के मंदिर में रोजाना पूजा और भोग की परंपरा पहले ही शुरू हो चुकी होती है.
पुरोहित ही पूजा की जिम्मेदारी संभालते हैं
शुक्ल पक्ष की नवमी तक लगातार मां को अन्नभोग चढ़ाया जाता है. इस पूजा की एक और खासियत है इसकी प्राचीन पूजा-पद्धति. यहां आज भी छपी हुई पूजा की किताब से मंत्र नहीं पढ़े जाते. पूजा के मंत्र ताड़पत्र की प्राचीन पांडुलिपि में लिखे हुए हैं और उन्हीं मंत्रों के अनुसार पूजा संपन्न की जाती है. पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार से जुड़े पुरोहित ही पूजा की जिम्मेदारी संभालते आ रहे हैं. सिर्फ पुरोहित ही नहीं, बल्कि मूर्तिकार, ढाकी और नाई समेत पूजा से जुड़े कई लोग भी पीढ़ियों से इसी परंपरा का हिस्सा हैं.
मां की प्रतिमा भी इस पूजा को खास बनाती है. यहां मां दुर्गा का चेहरा किसी सांचे से तैयार नहीं किया जाता. मूर्तिकार अपने हाथों से देवी का चेहरा बनाते हैं. आज भी यहां पारंपरिक एकचाला प्रतिमा की पूजा होती है और पूजा खत्म होने के बाद भी परंपरा नहीं बदलती. आधुनिक दौर में जहां प्रतिमाओं को ट्रॉली या वाहन से विसर्जन के लिए ले जाया जाता है, वहीं एथोरा में आज भी मां की एकचाला प्रतिमा को कंधे पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाया जाता है. अब बात उस परंपरा की, जो इस पूजा को सबसे अलग पहचान देती है.
पुरानी परंपरा आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र
संधि पूजा के बाद यहां बंदूक की आवाज सुनाई देती है. परिवार के सदस्यों के मुताबिक, पुराने समय में आसपास के इलाकों में ढाक की आवाज के जरिए बलि के समय का संकेत दिया जाता था. बाद में इस परंपरा में बंदूक की आवाज को संकेत के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा. संधि पूजा खत्म होने के बाद बंदूक की आवाज सुनते ही आसपास के कई स्थानों पर बलि की प्रक्रिया शुरू की जाती थी. आज मोबाइल फोन और दूसरे आधुनिक साधनों से समय की जानकारी आसानी से मिल जाती है, लेकिन एथोरा की बड़ी दुर्गा पूजा में यह पुरानी परंपरा आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है.
इस पूजा में बलि की भी पुरानी परंपरा रही है. पाठा बलि, भेड़ बलि, काड़ा बलि और भैंस बलि जैसी परंपराओं का उल्लेख परिवार की पूजा परंपरा में मिलता है. नवमी के दिन विशेष विधि से इक्षु बलि यानी गन्ने की बलि भी दी जाती है. लेकिन इस 700 साल पुरानी पूजा की खूबसूरती सिर्फ इसकी धार्मिक परंपराओं में नहीं है. यह पूजा परिवार को भी एक साथ जोड़ती है. नौकरी और कारोबार के सिलसिले में परिवार के कई सदस्य अलग-अलग शहरों में रहते हैं. लेकिन दुर्गापूजा आते ही परिवार के सदस्य एथोरा लौटते हैं. और फिर पूरा परिवार एक साथ मां की पूजा में शामिल होता है.
इस पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाने वालों में ढाकी भी शामिल हैं. खास बात यह है कि वर्तमान में यहां ढाक बजाने वाले व्यक्ति पेशे से प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक हैं. उनके पिता हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक रह चुके हैं. लेकिन दुर्गापूजा के चार दिनों में वह अपने पेशे से अलग अपनी पारिवारिक परंपरा निभाने के लिए मंदिर पहुंचते हैं और ढाक बजाते हैं.
700 साल से चली आ रही एक जीवित परंपरा
यह सिर्फ एक दुर्गापूजा नहीं, बल्कि करीब 700 साल से चली आ रही एक जीवित परंपरा है. जहां मुख्य पूजा से 15 दिन पहले ही मां की आराधना शुरू हो जाती है, हर दिन पूजा होती है, रोजाना भात का भोग चढ़ता है और सदियों पुरानी परंपराएं आज भी उसी तरह निभाई जाती हैं. आधुनिकता के दौर में जब कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, आसनसोल के एथोरा गांव की बड़ी दुर्गा पूजा आज भी अपनी विरासत को संभालकर रखे हुए है.
-अनिल गिरी
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