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Citizenship Amendment Act: पूर्वोत्तर के आदिवासी इलाके CAA के दायरे से बाहर, लेकिन क्यों, क्या केंद्र के कानून को लागू करने से मना कर सकते हैं राज्य?

CAA: नागरिकता कानून 1955 के तहत भारत की नागरिकता के लिए कम से कम 11 सालों तक देश में रहना जरूरी है. लेकिन CAA के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को 11 साल की बजाय 6 साल रहने पर ही नागरिकता दे दी जाएगी. 

Citizenship Amendment Act Citizenship Amendment Act
हाइलाइट्स
  • साल 2016 में सबसे पहले लोकसभा में नागरिकता संशोधन कानून किया गया था पेश 

  • 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आकर बसे गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को मिलेगी नागरिकता

मोदी सरकार ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (Citizenship Amendment Act) यानी सीएए (CAA) को लागू करने का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. इसके साथ ही नागरिकता संशोधन कानून देशभर में लागू हो गया है. सीएए को पूर्वोत्तर राज्यों के  आदिवासी इलाकों में लागू नहीं किया जाएगा, वहीं कई राज्य इसका विरोध कर रहे हैं. आइए जानते हैं क्यों अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम समेत इन राज्यों में सीएए लागू नहीं होगा? क्या केंद्र सरकार के कानून को लागू करने से राज्य मना कर सकते हैं? 

क्या है सीएए और किन्हें मिलेगी नागरिकता
साल 2016 में सबसे पहले लोकसभा में नागरिकता संशोधन कानून पेश किया गया था. फिर इसे दिसंबर 2019 में पेश किया गया. उसी साल लोकसभा और राज्यसभा से पास हो गया था. इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए ऐसे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी धर्म के लोगों को नागरिकता मिलेगी, जो 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आकर बस गए थे. 

इस कानून के दायरे से क्यों कुछ राज्यों को रखा गया है अलग
नागरिकता संशोधन कानून के दायरे से पूर्वोत्तर राज्यों के अधिकांश जनजातीय क्षेत्रों को अलग रखा गया है. कानून के मुताबिक इनर लाइन परमिट सिस्टम (आईएलपी) वाले पूर्वोत्तर के राज्यों नगालैंड, मिजोरम और मणिपुर में सीएए लागू नहीं होगा. इसके अलावा जिन जनजातीय क्षेत्रों में संविधान की छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त परिषदें बनाई गई हैं, उन्हें भी सीएए के दायरे से बाहर रखा गया है.

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असम, मेघालय और त्रिपुरा में ऐसी स्वायत्त परिषदें हैं. इसका मतलब साफ है कि अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर, असम, मेघालय और त्रिपुरा सीएए के दायरे से बाहर रहेंगे. इनर लाइन परमिट (ILP) और संविधान की छठी अनुसूची पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ इलाकों में जनजातीय समूहों को संरक्षण देने के मकसद से लागू किया गया था. मणिपुर पहले इनर लाइन परमिट में नहीं आता था, लेकिन बाद में इसे भी इसमें शामिल कर लिया गया. इन लाइन परमिट एक तरह का यात्रा दस्तावेज होता है, जो एक सीमित अवधि के लिए दूसरे राज्यों के लोगों का यात्रा करने के लिए दिया जाता है.

केरल और बंगाल सरकार सीएए के खिलाफ
केरल और बंगाल की सरकारें सीएए लागू करने के खिलाफ हैं. इसे लागू करने से इनकार कर दिया है. पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का कहना है कि यदि सीएए के नियमों के जरिए लोगों को उनके अधिकारों से वंचित किया गया तो वह इसके खिलाफ लड़ेंगी. ममता का कहना है कि सीएए लागू करना चुनाव के लिए बीजेपी का प्रचार है और कुछ नहीं.

उधर, केरल के सीएम पिनराई विजयन का कहना है कि उनकी सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह इस कानून को अपने राज्य में लागू नहीं होने देगी. उन्होंने इसे सांप्रदायिक कानून करार देते हुए कहा कि इसके विरोध में पूरा केरल एकजुट है. इतना ही नहीं असम में भी सीएए को लेकर विरोध शुरू हो गया है. असम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया है. 

क्या राज्य सरकारें केंद्र के कानून को मानने से कर सकती हैं इनकार
अब सवाल उठता है कि क्या राज्य सरकारें केंद्र के कानून को मानने से इनकार कर सकती हैं. इसका जवाब है नहीं. हमारे संविधान में संघ, राज्य और समवर्ती सूची है. इसमें बताया गया है कि केंद्र और राज्य सरकार के अधिकार में कौन-कौन से विषय आते हैं. सातवीं अनुसूची में इस बारे में बताया गया है. संघ सूची रक्षा, विदेश मामले, जनगणना, रेल और नागरिकता जैसे 100 विषय शामिल हैं. जिनमें कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संसद को है. वहीं राज्य सूची में शामिल विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार को है.

इसमें 61 विषय शामिल हैं. समवर्ती सूची में उन विषयों को शामिल किया गया है जिन पर केंद्र और राज्य, दोनों कानून बना सकतीं हैं. यदि केंद्र किसी विषय पर कानून बना लेता है तो राज्य को उसे मानना ही होगा. इसमें 52 विषय आते हैं. इस तरह से केंद्र की सूची में आने वाले विषय से जुड़े फैसलों पर राज्य सरकारों को निर्णय लेने का अधिकार नहीं है. 

कोर्ट में नहीं दे सकते चुनौती
सीएए का मामला नागरिकता से जुड़ा है, इसलिए इसे हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती.दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2020 में साफ कहा था कि सीएए से जुड़ा कोई भी मामला हाईकोर्ट में नहीं सुना जाएगा. सुप्रीम कोर्ट में सीएए के विरोध और समर्थन को लेकर पहले ही 200 से ज्यादा याचिकाएं दायर हैं. इस पर अभी तक कोर्ट का फैसला आया नहीं है.

हमारे देश में नागरिकता पर क्या है नियम
नागरिकता कानून 1955 के तहत भारत की नागरिकता के लिए कम से कम 11 साल तक देश में रहना जरूरी है. लेकिन नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को 11 साल की बजाय 6 साल रहने पर ही नागरिकता दे दी जाएगी. बाकी दूसरे देशों के लोगों को 11 साल का वक्त भारत में गुजारना होगा, भले ही फिर वो किसी भी धर्म के हों.