
collection centers
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दिल्ली में अब खंडित मूर्तियों के सम्मानजनक निस्तारण की पहल की गई है. सालभर जिन मूर्तियों को श्रद्धा और आस्था के साथ पूजा जाता है, उनके खंडित होने के बाद अक्सर उन्हें पेड़ के नीचे, पार्कों में, मंदिरों के आसपास या फिर यमुना और दूसरे जलस्रोतों में छोड़ दिया जाता है. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.
खंडित मूर्ति संग्रह केंद्र बनाए गए
दिल्ली में 110 से ज्यादा खंडित मूर्ति संग्रह केंद्र बनाए गए हैं, जहां लोग अपनी खंडित मूर्तियां और पूजा सामग्री सम्मान के साथ जमा कर सकेंगे. मकसद है आस्था का सम्मान भी हो और वेस्ट मैनेजमेंट भी बेहतर तरीके से किया जा सके.
अब लोग अपनी खंडित मूर्तियां लेकर यहां पहुंच रहे हैं और उन्हें खुले में छोड़ने के बजाय निर्धारित केंद्र में जमा कर रहे हैं. दिल्ली में अलग-अलग इलाकों में ऐसे केंद्र बनाए गए हैं द्वारका, रोहिणी, पीतमपुरा, केशव पुरम समेत कई जगहों पर लोगों को यह सुविधा दी जा रही है.
पेड़ के नीचे लावारिस छोड़ जाते हैं पूजा सामाग्री
आमतौर पर जब मूर्तियां खंडित हो जाती हैं या पूजा के बाद उनके निस्तारण की जरूरत होती है, तो कई बार लोग उन्हें पेड़ के नीचे, पार्कों में, मंदिरों के आसपास या फिर जलस्रोतों में छोड़ देते हैं…इससे धार्मिक आस्था से जुड़ी भावना भी प्रभावित होती है और साथ ही कचरा प्रबंधन और पर्यावरण के लिए भी चुनौती पैदा होती है.इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए ये संग्रह केंद्र बनाए गए हैं.
इन केंद्रों पर मूर्तियों को इकट्ठा किया जा रहा
लोगों के बीच भी इस पहल को लेकर जागरूकता बढ़ रही है क्योंकि सवाल सिर्फ मूर्ति के निस्तारण का नहीं है, सवाल ये भी है कि जिस मूर्ति को लोगों ने पूरी श्रद्धा के साथ पूजा है, उसके खंडित होने के बाद उसका सम्मान भी उसी तरह बना रहे. इसी सोच के साथ इन केंद्रों पर मूर्तियों और पूजा सामग्री को इकट्ठा किया जा रहा है, ताकि इसे खुले में फेंकने या जलस्रोतों में डालने के बजाय वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से इसका निस्तारण और रीसाइक्लिंग किया जा सके.

दरअसल, इस पूरी पहल का एक बड़ा फोकस वेस्ट मैनेजमेंट है. त्योहारों के दौरान बड़ी संख्या में मूर्तियां और पूजा सामग्री निकलती है. ऐसे में कोशिश है कि यह सामग्री सड़कों, पार्कों या सीधे यमुना में न पहुंचे. खास तौर पर त्योहारों के समय यमुना में बढ़ने वाले प्रदूषण को रोकने के लिहाज से भी इस तरह के वैकल्पिक संग्रह केंद्र अहम हैं.
लोगों का कहना है कि 21वीं सदी में आस्था और पर्यावरण. दोनों को साथ लेकर चलने की जरूरत है.जरूरी नहीं कि मूर्ति का विसर्जन सिर्फ यमुना में ही किया जाए. अगर उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ मूर्ति का वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण और रीसाइक्लिंग की जा सकती है, तो पर्यावरण को बचाने के लिए इस विकल्प को भी अपनाया जाना चाहिए.
रेखा गुप्ता ने भी व्यवस्था का जायजा लिया
दिल्ली सरकार की ओर से भी इस पहल को बढ़ावा दिया जा रहा है और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी खंडित मूर्तियों के सम्मानजनक निस्तारण से जुड़ी इस व्यवस्था का जायजा लिया है. सरकार का जोर इस बात पर है कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जाए. यानी अब खंडित मूर्तियां न पेड़ों के नीचे लावारिस मिलेंगी…न पार्कों में दिखाई देंगी…और न ही आस्था के नाम पर यमुना में कचरा बढ़ेगा. 110 से ज्यादा संग्रह केंद्रों के जरिए कोशिश यही है आस्था का सम्मान हो, मूर्ति का सम्मान हो और दिल्ली का पर्यावरण भी सुरक्षित रहे.
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