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गंगा में आई बाढ़, तो नाविकों ने आजीविका के लिए बदला रुख... कोई बना फोटोग्राफर... तो कोई फूलमाला बेचने को मजबूर

गंगा में बाढ़ के कहर का असर नाविकों की आजीविका पर काफी गहरा पड़ा है. इस बाढ़ के चलते जहां अब उनकी आय लगभग आधी हो चुकी है. जो लोग फोटोग्राफर बने हैं उनके लिए अलग परेशानी है, क्योंकि लोग अब अपने फोन में खुद फोटो कैद कर लेते हैं.

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आजीविका के लिए नाविक बने फोटोग्राफर आजीविका के लिए नाविक बने फोटोग्राफर

गंगा में आई बाढ़ के दौरान सबसे पहले एहतियातन प्रशासन नौका संचालन पर रोक लगा देती है. जिसके चलते नाविकों के आगे आजीविका का संकट खड़ा हो जाता है. वाराणसी में भी गंगा ने चेतावनी बिंदु पार कर लिया है और पिछले कई हफ्तों से नौका संचालन बंद है. जिससे हजारों नाविक बेरोजगार हो गए है, लेकिन कभी आपने सोचा है कि आखिर बजाए गंगा में नाव चलाने के नौका संचालन के प्रतिबंध के दौरान नाविक करते क्या है? और अपना रोजी-रोटी कैसे कमाते है? 

वाराणसी में तमाम नाविक बाढ़ के दौरान नौका संचालन छोड़कर या तो फोटोग्राफी करते है या फिर फ्लावरमैन यानी गंगा किनारे फूल-माला बेचने लगते है, जिससे वे जितना नाव चलाकर कमाते है, उससे कम ही सही, लेकिन अपनी आजीविका भर कमा लेते है.

मजबूरी के कारण नाविक नहीं चला पा रहे नाव

पुरानी कहावत है कि मजबूरी इंसान को सबकुछ सीखा देती है. यही मजबूरी वाराणसी के बाढ़ पीड़ितों नाविकों के आगे बाढ़ की विभीषिका के रूप में हर वर्ष आ जाती है. जब प्रशासन नौका संचालन पर रोक लगा देता है. देर से ही सही इस बार गंगा ने अपना रौद्र रुप दिखाना शुरू कर दिया है. जिसके चलते वाराणसी में गंगा का जलस्तर चेतावनी बिंदु के पार चला गया है और नौका संचालन पर भी रोक हफ्तों से लगी हुई है. 

अब जब काशी के हजारों नाविक नाव का संचालन नहीं कर पा रहे है तो इस मौसमी बेरोजगारी में दूसरा हुनर में अपने आप को ढाल लिया है. कोई वहीं गंगा घाट पर फोटोग्राफी सीखकर सैलानियों और आस्थावानों की तस्वीरें खींच रहा है तो कोई छोटी फूल-माला की दुकान ही खोल लिया है. 

नाविक बने कैमरामैन

शिवाकांत साहनी से जो पिछले 5-6 वर्षों से बाढ़ के सीजन में फोटोग्राफी करते है. खास बातचीत में वे बताते है कि वे आम लोगों की तरह महीने की नौकरी नहीं कर सकते है, क्योंकि उन्हें रोज कमाई करनी होती है और रोज खर्च भी रहता है. इसीलिए उन्होंने कैमरा लेने की सोची. उन्होंने बताया कि एक फोटो खींचकर और डेवलप करके देने का उनका कॉस्ट 12 रुपया आता है और उसे आगे 30-50 रुपए में सेल कर देते है. प्रतिदिन 10-20 फोटो की खींच पाते है, क्योंकि बहुत सारे फोटोग्राफर हो गए है. इस तरह रोजाना 300-500 रुपए कमा लेते है. शिवाकांत ने बताया कि सभी घाटों को मिला ले तो नाविक से फोटोग्राफर बने लोग 300 तक होंगे और सभी फोटोग्राफर को मिला ले तो 500 से ऊपर संख्या होगी.

युवा नाविक विकास साहनी भी गले में कैमरा लटकाए लोगों की फोटो दशाश्वमेध घाट पर खींचता नजर आया. उसने बताया कि सामान्य दिनों में नाव चलाते है और बाढ के दिनों में फोटोग्राफी करते है. दिनभर में 10-15 फोटो तक क्लिक कर लेते है. रोज कुल प्रॉफिट 300-500 रुपए हो जाता है. उन्होंने बताया कि अच्छे कैमरों वाले मोबाइल के आ जाने से लोग उसी से तस्वीरे क्लिक कर लेते है और रील भी बना लेते है. जिससे उनके काम पर बहुत असर पड़ा है.

माला बेचने को हुए मजबूर, कमाई हुई आधी

नाव बंद हो जाने पर फूल माला की छोटी दुकान दशाश्वमेध घाट पर लगाने वाले सागर साहनी ने बताया कि नाव चलाकर 600-700 रुपए प्रतिदिन कमाते थे, लेकिन अभी माला बेचकर 300-400 रुपए ही कमा पाते है. ये काम मजबूरी में करना पड़ रहा है. उन्होंने बताया कि पिछले 10 साल से बाढ़ के मौसम में फूल-माला बेच रहे है. जिससे परिवार चल जा रहा है. फूलमाला ही बेचने वाले एक अन्य नाविक शंकर साहनी ने भी कमोबेश ऐसा ही बताया.

दर्शनार्थी कर रहे नाविको की तारीफ

दिल्ली से अपनी मां के साथ दर्शन के लिए काशी पहुंची अंजू ने बताया कि उन्हे फोटो काफी पसंद आई. वैसे तो उन्हे बोट राइड भी करनी थी, लेकिन रोक की वजह से वे नहीं कर सकी. उन्होंने नाविकों की मेहनत की सराहना भी की. तो वहीं मुंबई से आए रविंद्र ने भी बताया कि बाढ़ की वजह से नाव न चला पाने वाले नाविक फोटोग्राफी और अन्य काम कर रहे है. ऐसे में सबके पालनहार ही उनकी मदद कर रहे है.