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आंखों की रोशनी जाने के बाद भी नहीं मानी हार, तमाम चुनौतियों के बावजूद पारंपरिक कुर्सी बनाकर करते हैं घर परिवार का गुजारा

गुजरात के पाटन के रहने वाले मगनलाल ठाकुर ने एक बीमारी के चलते ही अपने दोनों आंखों की रोशनी खो दी थी. लेकिन मगनलाल ने कभी भी अपनी परिस्थिति के आगे घुटने नहीं टेके और वो अपने परिवार का पेट पालने के लिए आज भी पारंपरिक कुर्सी बनाते हैं.

मगनलाल ठाकुर मगनलाल ठाकुर
हाइलाइट्स
  • नेत्रहीन होकर भी बना रहे कुर्सी

  • बीमारी के कारण चली गई थी आंखें

दुनिया में ऐसे कई लोग होते हैं जो अपना सब कुछ खो देते हैं. लेकिन बावजूद इसके अपनी हिम्मत नहीं खोते. उनके पास रुक कर कर दुख मनाने का या अफसोस करने का भी समय नहीं होता है. वे निरंतर आगे बढ़ते हैं और अपने लिए जीने की कोई ना कोई वजह ढूंढ ही लेते हैं.

कुछ ऐसे ही कहानी 68 वर्षीय मगनलाल ठाकुर की है, जिनकी जिंदगी में कई मुश्किलें आयीं. लेकिन उन्होंने हमेशा अपने पैरों पर खड़े होना सीखा. दरअसल मगनलाल भाई अपने दोनों आंखों की रोशनी खो चुके हैं. वो परिवार में कमाने वाले वह अकेले ही व्यक्ति हैं. अपने परिवार के लिए उन्होंने यह तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए वो रुकेंगे नहीं. इसलिए वे नेत्रहीन होने के बावजूद कुर्सियां बनाने का काम करते हैं. लेकिन यह कुर्सियां कोई आम कुर्सियां नहीं है. ये कुर्सियां अगर कोई आम आदमी बनाए तो उसे लंबा समय लग जाएगा. लेकिन मगनलाल भाई इसे बेहद सरलता से एक से दो दिन में पूरा कर देते हैं.

नेत्रहीन होकर भी बना रहे कुर्सी
मगनलाल के दिन की शुरुआत सुबह 7 बजे से होती है. 8 बजे वो बस से अपनी दुकान के लिए निकल जाते हैं. दुकान पर पहुंचते ही वो कुर्सियां बनाने का काम शुरू कर देते हैं. उनकी दुकान भी कोई बहुत बड़ी या हाईटेक दुकान नहीं है, बल्कि दो बाई दो में बनी पतरे की दुकान है. इसी में वो दिन भर काम करते हैं और शाम को घर के लिए निकलते हैं. मगनलाल बताते हैं कि एक कुर्सी बनाने के उन्हें ढाई सौ रुपए मिलते हैं. जिसमें से उनका मुनाफा सौ या डेढ़ सौ का ही हो पाता है. उनका मानना है कि जब तक व्यक्ति अपने दम पर काम करता है वह स्वाभिमान के साथ जीता है.

मनु लाल की एक बेटी और पत्नी है. उनकी पत्नी की यह दूसरी शादी है. उनकी पत्नी बताती हैं कि उनका पहला पति उन्हें बहुत मारता था इसलिए उन्होंने पहले पति को छोड़ दिया. लेकिन उन्होंने मगनलाल से इसलिए शादी की क्योंकि उन्होंने उनके काम के अहमियत को और जुझारूपन को समझ लिया था. उन्होंने बताया कि वे जानती थी कि मगनलाल नेत्रहीन है लेकिन वह हर कीमत पर अपने काम को प्राथमिकता देते हैं और अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटते. इसलिए उन्होंने मगनलाल से शादी की.

बीमारी के कारण चली गई थी आंखें
मगनलाल बताते हैं कि जब वे आठ साल के थे तब किसी बीमारी के कारण उनकी दोनों आंखें चली गई थी. उस समय तो ऐसा लगा कि बस अब जान ही चली जाए लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि आंख चली जाने से जिंदगी नहीं जाती. इसलिए वे आज अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं. वे कहते हैं कि आंखों की रोशनी जाने के बाद चुनौतियां तो कई आई. लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. यह नहीं समझा कि वे कमजोर है.

वे कहते है कि आगे भी इसी तरह से काम करते रहना चाहते हैं और लोगों को भी यही कहते हैं कि चाहे परिस्थितियां विपरीत हों लेकिन उनका सामना करें. उसी से आप मजबूत होंगे.