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history of Madhubani painting: मधुबनी पेंटिंग का रहस्य... 1934 के विनाशकारी भूकंप ने कैसे दिलाई इस कला को वैश्विक पहचान

मिथिला पेंटिंग, जिसे आज दुनिया भर में सराहा जाता है, उसकी जड़ें रामायण काल से जुड़ी मानी जाती है. हालांकि, इस कला को वैश्विक पहचान 15 जनवरी 1934 को आए विनाशकारी भूकंप के बाद मिली.

भूकंप से दुनिया के सामने आई मधुबनी पेंटिंग भूकंप से दुनिया के सामने आई मधुबनी पेंटिंग
हाइलाइट्स
  • मिथिला की धरोहर मधुबनी पेंटिंग का इतिहास

  • पहचान में आई 1934 के भूकंप के बाद

मिथिला पेंटिंग की कहानी सिर्फ रंगों और आकृतियों की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की है. दरअसल मधुबनी चित्रकारी की जड़ें बहुत गहरी हैं. गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामायण में इसका उल्लेख किया है. जब भगवान राम और माता सीता के विवाह का प्रसंग आता है, तब घरों की दीवारों को चित्रों से सजाने का वर्णन मिलता है. इससे यह संकेत मिलता है कि त्रेता युग में भी मिथिला क्षेत्र में दीवारों पर चित्रकारी की समृद्ध परंपरा मौजूद थी. 

एक भूकंप से उजागर हुई कला
दुनिया की नजर इस अद्भुत कला पर 1934 में पड़ी, जब मिथिला क्षेत्र में भीषण भूकंप आया. 15 जनवरी बिहार-नेपाल क्षेत्र में आए विनाशकारी भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.0 से 8.4 के बीच थी. उस घटना ने कई जिंदगियों को उथल-पुथल कर दिया. कई घर गिर गए. इस विध्वंस के बाद क्षेत्र के एसडीओ विलियम जॉर्ज आर्चर निरीक्षण के लिए मधुबनी जिले में पहुंचे. टूटे हुए घरों की दीवारों पर बने रंग-बिरंगे चित्रों ने उनका ध्यान खींचा. उन दीवारों पर उकेरी गई आकृतियां, देवी-देवताओं के चित्र जैसी थी. ज्यादातर चित्र पर सीता-राम, शिव-पार्वती और दूसरे देवताओं के साथ पारंपरिक डिजाइन देखकर वे चकित रह गए. यहीं से मिथिला पेंटिंग पहली बार दुनिया के सामने आई और धीरे-धीरे इस लोककला ने वैश्विक पहचान बना ली.

मधुबनी पेंटिंग का इतिहास
मिथिला चित्रकला, जिसे आज मधुबनी पेंटिंग के नाम से भी जाना जाता है, भारत की सबसे समृद्ध लोक कलाओं में से एक मानी जाती है. इसका विकास प्राचीन मिथिला नगरी में हुआ माना जाता है, जिसे राजा जनक की पुत्री माता सीता का जन्मस्थान कहा जाता है. लोक मान्यता के अनुसार, जब सीता का विवाह अयोध्या के भगवान राम से तय हुआ, तब राजा जनक ने इस शुभ अवसर पर महल और घरों की दीवारों को सुंदर चित्रों से सजवाया था. माना जाता है कि यहीं से इस कला की शुरुआत हुई.

घरेलू कला से वैश्विक पहचान तक
शुरुआत में यह कला घरेलू मानी जाती थी. खासकर सामाजिक रीति-रिवाजों, विवाह और धार्मिक अवसरों पर महिलाएं घरों की दीवारों पर इसे बनाती थीं. समय के साथ इसकी मांग बढ़ी और कलाकार केवल दीवारों तक सीमित नहीं रहे. अब यह कला कैनवास, कागज, कपड़े और सजावटी वस्तुओं पर भी बनाई जाने लगी. इसी वजह से मिथिला चित्रकला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली.

मधुबनी चित्रकला केवल सजावट नहीं, बल्कि एक गहरी दार्शनिक सोच को भी दर्शाती है. यह द्वैतवाद के सिद्धांतों पर आधारित मानी जाती है, जहां विपरीत तत्व साथ-साथ मौजूद होते हैं, जैसे दिन और रात, सूर्य और चंद्रमा, जीवन और प्रकृति. इन चित्रों में देवी-देवता, सूर्य, चंद्रमा, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और ब्रह्मांडीय तत्वों को प्रमुखता से दर्शाया जाता है. इसके अलावा धार्मिक कहानियों को बयान करता है. 

विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में इन महिलाओं का विशेष योगदान
मधुबनी पेंटिंग को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में कई महिला कलाकारों का अहम योगदान रहा है. इस क्षेत्र में पहली पद्म श्री सम्मानित कलाकार जगदंबा देवी थीं, जिन्हें 1975 में सम्मान मिला. इसके बाद सीता देवी, गंगा देवी, महासुंदरी देवी, बौआ देवी, गोदावरी दत्ता और दुलारी देवी का भी इस कला को पहचान दिलाने में बड़ा योगदान था, जिसके लिए इन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया. 

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