रावण दहन के लिए उखाड़ने पड़ रहे पेड़.
रावण दहन के लिए उखाड़ने पड़ रहे पेड़.
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर पौधरोपण करना अच्छी पहल है, लेकिन जब इसी पहल के कुछ दिनों बाद लगाए गए पेड़ों को उखाड़ने की नौबत आ जाए, तो जिम्मेदारों की योजना और दूरदर्शिता पर सवाल उठना लाजिमी है. झांसी में रेलवे का एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने पौधरोपण अभियान की तैयारियों और अधिकारियों की कार्यशैली को चर्चा में ला दिया है. दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत जिस मैदान में बड़ी संख्या में पेड़ लगाए गए थे, अब उसी मैदान से करीब 50 से 60 पेड़ों को उखाड़कर दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है. वजह है दशहरा पर होने वाला रावण दहन, जो इस मैदान में वर्षों से परंपरागत रूप से आयोजित किया जाता रहा है.
आखिर क्यों नहीं रखा गया इस बात का ध्यान
सवाल यह है कि जिस मैदान पर हर साल दशहरे का आयोजन होता है, वहां पौधे लगाने से पहले इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखा गया. क्या पौधरोपण अभियान की योजना बनाते समय रेलवे अधिकारियों को इस आयोजन की जानकारी नहीं थी. यदि जानकारी थी, तो फिर ऐसी जगह पर पेड़ लगाने का फैसला क्यों लिया गया, जहां कुछ ही समय बाद उन्हीं पेड़ों को हटाने की जरूरत पड़ गई. पर्यावरण बचाने के उद्देश्य से लगाए गए पौधों को कुछ ही समय में उखाड़ने की स्थिति पैदा होना रेलवे की योजना पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.
बड़ी संख्या में लगाए गए थे पेड़
उत्तर मध्य रेलवे के झांसी मंडल की ओर से 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधरोपण कराया गया था. इस अभियान का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना और अधिक से अधिक पेड़ लगाकर हरियाली बढ़ाना है. इसी क्रम में झांसी में रेलवे की नई कोच फैक्ट्री के सामने स्थित मैदान में भी बड़ी संख्या में पेड़ लगाए गए थे. अभियान के दौरान लगाए गए इन पौधों को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना गया लेकिन अब इन्हीं पेड़ों को उखाड़कर दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने से पूरा मामला सवालों के घेरे में आ गया है. जिस मैदान में पौधरोपण किया गया, वहां दशहरा के अवसर पर वर्षों से रावण दहन का आयोजन होता रहा है. ऐसे में पौधरोपण से पहले मैदान के पारंपरिक उपयोग और आगामी कार्यक्रम को ध्यान में रखना जरूरी था.
वर्षों से होता आ रहा है रावण दहन
रेलवे का यह मैदान दशहरे के आयोजन के लिए जाना जाता है. यहां हर साल रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि पौधरोपण की योजना तैयार करते समय आयोजन स्थल की जरूरतों का आकलन क्यों नहीं किया गया. यदि मैदान में रावण दहन होना पहले से तय था, तो ऐसी जगह पौधे लगाने का निर्णय क्यों लिया गया, जहां आयोजन के लिए बाद में उन्हें हटाना पड़े? स्थानीय स्तर पर इस मामले को लेकर हैरानी जताई जा रही है. लोगों का सवाल है कि क्या पौधरोपण से पहले संबंधित अधिकारियों ने मैदान का निरीक्षण किया था? क्या यह तय किया गया था कि लगाए गए पौधे भविष्य में किसी आयोजन या सार्वजनिक गतिविधि में बाधा नहीं बनेंगे? यदि इन पहलुओं पर पहले विचार किया गया होता, तो शायद अब पेड़ों को उखाड़कर दूसरी जगह ले जाने की स्थिति पैदा नहीं होती.
रेलवे ने माना, 50-60 पेड़ों को किया जा रहा शिफ्ट
मामले को लेकर जब रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी मनोज कुमार से जानकारी ली गई, तो उन्होंने बताया कि मैदान से लगभग 50 से 60 पेड़ों को उखाड़कर दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संबंधित मैदान में वर्षों से रावण दहन का आयोजन होता आ रहा है. हालांकि, जब यह सवाल उठा कि इस परंपरा की जानकारी होने के बावजूद उसी मैदान में पौधरोपण क्यों कराया गया, तो इसका स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका. ऐसे में पौधरोपण की योजना तैयार करने और स्थान का चयन करने में बरती गई सावधानी को लेकर सवाल बने हुए हैं.
पर्यावरण संरक्षण की पहल, लेकिन योजना पर सवाल
पेड़ लगाना पर्यावरण के लिए जरूरी है, लेकिन पौधरोपण का उद्देश्य केवल पौधे लगा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए. उनकी सुरक्षा, देखभाल और उचित स्थान का चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण है. यदि किसी स्थान पर पहले से कोई बड़ा सार्वजनिक आयोजन होता है, तो पौधरोपण से पहले उसकी जरूरतों का आकलन करना जरूरी है. झांसी में सामने आया यह मामला इसी ओर ध्यान दिलाता है कि सरकारी अभियानों में केवल संख्या बढ़ाने के बजाय बेहतर योजना और समन्वय पर भी जोर दिया जाना चाहिए. प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर लगाए गए पौधों को अब दूसरी जगह शिफ्ट किया जा रहा है. रेलवे का कहना है कि पेड़ों को स्थानांतरित किया जा रहा है, लेकिन इस पूरी कवायद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, जब मैदान में दशहरे पर रावण दहन होना पहले से तय था, तो पौधरोपण के लिए उसी जगह का चयन क्यों किया गया?