
लक्ष्मी के हिम्मत की कहानी
लक्ष्मी के हिम्मत की कहानी
यह कहावत तो आपने सुन ही रखी होगी, 'होनहार बिरवान के होत चिकने पात' कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है कटिहार जिले के हसनगंज प्रखंड स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय भतौरिया में कक्षा 4 में पढ़ने वाली दिव्यांग लक्ष्मी ने. दोनों हाथों से दिव्यांग होने के बावजूद लक्ष्मी ने कभी अपने सपनों को कमजोर नहीं पड़ने दिया. वह अपने पैरों को ही अपनी ताकत बनाकर पढ़ाई से लेकर रोजमर्रा के काम तक करती है और आगे चलकर शिक्षक बनना चाहती है.
जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग है लक्ष्मी
लक्ष्मी एक मजदूर परिवार से आती है. उसके पिता गांव में मजदूरी करके किसी तरह परिवार का गुजर-बसर करते हैं. चार भाई-बहनों में लक्ष्मी जन्म से ही दोनों हाथों से दिव्यांग है. उसके जन्म के बाद आसपास और समाज के लोगों ने उसके माता-पिता को तरह-तरह के ताने दिए. कोई उसे फेंक देने की बात कहता था, तो कोई कहता था कि लक्ष्मी आई है, इसे पालो. हालांकि, लक्ष्मी के माता-पिता ने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपनी बेटी को काफी जतन से पाल-पोस रहे हैं.

मां ने कहा- बेटी के लिए कभी हार नहीं मानी
लक्ष्मी की मां रेणु ने बताया कि बेटी के जन्म के बाद उन्होंने कभी हार नहीं मानी. उन्होंने बेटी के नसीब पर सब कुछ छोड़ते हुए यह फैसला लिया कि जब तक माता-पिता जिंदा हैं, तब तक उसकी देखभाल करेंगे और उसे खाना-पीना देते रहेंगे. रेणु का कहना है कि लक्ष्मी की सहायता के लिए अब तक सरकार की तरफ से कोई प्रयास नहीं किया गया है. वह सरकार से अपनी बेटी के भविष्य के लिए मदद की गुहार लगा रही हैं, ताकि लक्ष्मी की पढ़ाई-लिखाई में सहायता मिल सके.

पैरों से करती है पढ़ाई और रोजमर्रा के काम
कक्षा 4 में पढ़ने वाली लक्ष्मी खुद पढ़-लिखकर शिक्षक बनना चाहती है. वह बताती है कि हाथ नहीं होने की वजह से स्कूल में बच्चे उसे चिढ़ाते भी हैं. इसके बावजूद लक्ष्मी ने हिम्मत नहीं छोड़ी है. वह पढ़ाई-लिखाई से लेकर खाना-पीना तक अपने पैरों से ही करती है. लक्ष्मी अपने सपनों को उड़ान देना चाहती है और पढ़-लिखकर शिक्षक बनकर अपना भविष्य संवारना चाहती है.
शिक्षक भी लक्ष्मी के हौसले से प्रभावित
स्कूल में लक्ष्मी को पढ़ाने वाली शिक्षिका रिंकू और स्कूल के प्रिंसिपल विनय चौधरी लक्ष्मी को लेकर काफी भावुक हैं. उनका कहना है कि लक्ष्मी पढ़ाई में अव्वल है और पढ़ाई को लेकर काफी सजग रहती है. वह प्रतिदिन पैदल चलकर स्कूल आती है. स्कूल के शिक्षक और शिक्षिकाएं भी लक्ष्मी के उज्ज्वल भविष्य को लेकर चिंतित हैं और उसके लिए सरकारी मदद की मांग कर रहे हैं. लक्ष्मी के दोनों हाथों से दिव्यांग होने के कारण स्कूल में उसकी विशेष देखभाल की जाती है.

स्कूल में मिलती है हर संभव मदद
लक्ष्मी गरीब परिवार से है, इसलिए शिक्षक स्कूल में खास तौर पर उसे हर दिन मिड-डे मील का खाना खिलाते हैं. स्कूल के प्राध्यापक विनय चौधरी ने सभी शिक्षकों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि स्कूल से मिलने वाली सभी सुविधाएं, जैसे कॉपी, किताब और स्कूल बैग, लक्ष्मी को समय पर उपलब्ध कराई जाएं. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखने के लिए कहा गया है कि लक्ष्मी हर दिन स्कूल में पढ़ाई करने के बाद सुरक्षित अपने घर पहुंचे.
स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची लक्ष्मी के पास
स्थानीय समाचार पत्र में लक्ष्मी की कहानी पढ़ने के बाद हसनगंज प्रखंड के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी आयुष भारद्वाज खुद स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ लक्ष्मी के पास पहुंचे. टीम ने लक्ष्मी का स्वास्थ्य परीक्षण किया. इसके बाद सामाजिक कोषांग से उच्चस्तरीय बातचीत कर समाज कल्याण विभाग की ओर से लक्ष्मी को मिलने वाले सभी सरकारी लाभ दिलाने के लिए प्रयास शुरू किए गए हैं.

क्या सरकारी मदद से पूरा होगा लक्ष्मी का सपना?
अब सवाल यह है कि दोनों हाथों से दिव्यांग लक्ष्मी ने अपने पैरों के बल जिस भविष्य का सपना देखा है, क्या वह उसे पूरा कर पाएगी? क्या शिक्षक बनने की उसकी इच्छा को सरकारी मदद से नई उड़ान मिलेगी? लक्ष्मी के हौसले ने यह जरूर दिखा दिया है कि परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हों, मजबूत इरादों के साथ सपनों की ओर बढ़ा जा सकता है.
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