Monsoon Covers Almost All of India
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दक्षिण-पश्चिम मॉनसून अब लगभग पूरे भारत को कवर कर चुका है. आमतौर पर लोगों को लगता है कि जैसे ही मॉनसून किसी राज्य में पहुंच जाता है, वहां अच्छी बारिश शुरू हो जाएगी. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक 4 जून से 2 जुलाई के बीच देश में सामान्य 172.4 मिमी बारिश के मुकाबले सिर्फ 111.8 मिमी बारिश हुई है. यानी देशभर में अब भी करीब 35% बारिश की कमी दर्ज की गई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब मॉनसून पूरे देश में पहुंच चुका है, तो बारिश इतनी कम क्यों हो रही है?
मॉनसून आना और अच्छी बारिश होने में फर्क
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मॉनसून के पहुंचने (Onset) और अच्छी बारिश होने का मतलब एक जैसा नहीं होता. जब IMD किसी इलाके में मॉनसून पहुंचने की घोषणा करता है, तो उसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि वहां मॉनसूनी हवाएं और मौसम की परिस्थितियां बन चुकी हैं. इसका यह मतलब नहीं होता कि उसी समय तेज या लगातार बारिश भी होगी. यानी मॉनसून का नक्शा यह बताता है कि बारिश लाने वाली हवाएं कहां तक पहुंचीं, लेकिन कितनी बारिश होगी, यह दूसरी बात है.
इस बार मॉनसून की रफ्तार कई बार थम गई
इस साल मॉनसून ने केरल में समय से पहले दस्तक दी थी, लेकिन उसके बाद इसकी रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई. करीब दो हफ्तों तक मॉनसून आगे नहीं बढ़ पाया क्योंकि अनुकूल हवाएं कमजोर हो गई थीं. बाद में मॉनसून ने फिर से उत्तर भारत की ओर बढ़ना शुरू किया, लेकिन इस दौरान भी देश के कई हिस्सों में बारिश रुक-रुक कर हुई. कई राज्यों में लंबे समय तक सूखा जैसा माहौल बना रहा. यही वजह है कि मॉनसून पूरे देश में पहुंचने के बावजूद कुल बारिश सामान्य से काफी कम रही.
किन राज्यों में सबसे ज्यादा बारिश की कमी है?
IMD के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे बड़े राज्यों में अब भी सामान्य से कम बारिश हुई है. सबसे ज्यादा चिंता गुजरात और मेघालय को लेकर है. इन दोनों राज्यों में सामान्य से 60% से 99% तक कम बारिश रिकॉर्ड की गई है. वहीं राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल में बारिश लगभग सामान्य रही है. दूसरी ओर लद्दाख, सिक्किम और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है.
एल नीनो जैसी परिस्थितियां भी बन रही हैं बड़ी वजह
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार बारिश के असमान वितरण के पीछे एल नीनो (El Niño) जैसी परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं. एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ जाता है. इसका असर भारत के मॉनसून पर पड़ता है. इससे मॉनसूनी हवाएं कमजोर हो सकती हैं और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले लो-प्रेशर सिस्टम कम बनते हैं. यही लो-प्रेशर सिस्टम देश के अंदरूनी इलाकों तक अच्छी बारिश पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं. इनके कमजोर होने से कई राज्यों में बारिश कम हो जाती है.
खेती और पानी पर क्या असर पड़ सकता है?
बारिश की कमी का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ रहा है. धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलें समय पर बारिश पर निर्भर रहती हैं. अगर जुलाई में भी पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. इसी आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने संबंधित मंत्रालयों से वैकल्पिक तैयारी करने को कहा है. कम बारिश का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा. इससे बांधों और जलाशयों में पानी कम जमा होगा, जिससे पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है.
अब सबसे अहम हैं जुलाई के अगले कुछ हफ्ते
अब जबकि मॉनसून लगभग पूरे देश में पहुंच चुका है, असली चुनौती इसकी बारिश की क्षमता है. मौसम विभाग की नजर अब इस बात पर है कि जुलाई के बाकी दिनों में कितनी बारिश होती है.
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