Delhi Protest
Delhi Protest
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के जबरदस्त प्रदर्शन और आंदोलन के बीच कई शहरों में हुई हिंसा की तस्वीर लोगों ने देखी, बिहार में तो हिंसा को काबू में करने के लिए पुलिस को एक-47 से हवाई फायर करना पड़ा. लेकिन यूपी में बंदूक और पिस्टल तो दूर एक लाठी भी नहीं चली. बिहार के कई शहरों में जबरदस्त तोड़फोड़ हुई. पटना, कटिहार, सिवान, मोतिहारी, छपरा जैसे शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए. असामाजिक तत्वों ने उत्पात मचाया. लेकिन उत्तर प्रदेश में कहीं भी प्रदर्शन हिंसक नहीं हुआ. कोई तोड़फोड़ नहीं हुई, कोई पत्थर नहीं चले.
योगी सरकार ने बनाया था एक खास कानून-
यूपी के कई जिलों जंतर मंतर के आंदोलन में शामिल होने छात्र पहुंचे थे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई चेहरे दिल्ली हिंसा में भी दिखाई दिए. लेकिन यूपी में हिंसा करने की हिम्मत नहीं हुई. वजह बड़ी साफ है 2020 में CAA के आंदोलन के समय यूपी के कई जिलों में हिंसक प्रदर्शन हुए थे. लखनऊ से लेकर मेरठ तक जबरदस्त हिंसा हुई थी और कई लोगों की जानें भी गई थी. लेकिन उसके बाद से भीड़तंत्र लगभग काबू में आ गया. वजह थी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की वो पहल, जिसके बाद भीड़ की शक्ल में हिंसा करने वाले लोगों के हाथ कांपते हैं.
CAA विरोध के बाद सड़क पर उपद्रव, आगजनी और हिंसा से निपटने के लिए योगी सरकार ने नया कानून बनाया था. जिसे नाम दिया गया उत्तर प्रदेश लोक तथा निजी सम्पत्ति क्षति वसूली अध्यादेश 2020 (Uttar Pradesh Recovery of Damages to Public and Private Property Ordinance, 2020). ये अध्यादेश 13 मार्च 2020 को कैबिनेट में पास हुआ था, बाद में यही कानून बन गया.
क्यों लाया गया था ये कानून-
दिसंबर 2019 में 19-20 दिसंबर को CAA विरोध के नाम पर लखनऊ समेत UP के कई शहरों में आगजनी और हिंसा हुई थी और सार्वजनिक संपत्ति को काफी नुकसान पहुंचा था. तब CM योगी ने निर्देश दिया था कि वीडियोग्राफी और CCTV फुटेज से उपद्रवियों की पहचान कर उनकी प्रॉपर्टी जब्त की जाएगी.
इस कानून में क्या है?
पहले अध्यादेश, फिर कानून बनाया गया-
इसी अध्यादेश के आधार पर सरकार ने लखनऊ में 50 से ज्यादा आरोपियों के पोस्टर चौराहों पर लगाए थे और 372 लोगों को वसूली नोटिस भेजे थे. बाद में हाईकोर्ट की आपत्ति के बाद सरकार ने इस अध्यादेश को कानूनी कवच के तौर पर इस्तेमाल किया था. इस कानून के अमल में आते ही भीड़ में हिंसा करने वालों के बीच एक डर भी बैठ गया कि हिंसा तो कर लोगे, लेकिन परिवार और समाज इसकी कीमत चुकाएगा और हुआ भी यही था. CAA के बाद पहले पोस्टर चौक चौराहों पर लगाए गए, फिर जब सरकार ने वसूली शुरू की तो गरीब परिवारों से जुड़े लोगों के लिए अपने जमीन जायदाद बेचने तक की नौबत आ गई. उसके बाद कई सामाजिक संगठनों ने आगे बढ़कर क्षतिपूर्ति के पैसे सरकारी कोष में जमा किए.
इस एक कानून ने फिलहाल यूपी में भीड़ तंत्र को काबू में कर लिया है. लेकिन यह भीड़ तंत्र कब तक काबू में रहेगा? यह कहना मुश्किल है.
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