वीके शशिकला के कार्यालय के एक बयान ने तमिल सुपरस्टार रजनीकांत के साथ उनकी मुलाकात को शिष्टाचार भेंट बताया
वीके शशिकला के कार्यालय के एक बयान ने तमिल सुपरस्टार रजनीकांत के साथ उनकी मुलाकात को शिष्टाचार भेंट बताया
सात दिसंबर को वी के शशिकला ने रजनीकांत से मुलाकात की, इस मुलाकात के बाद तमिलनाडु की सियासत में नई सरगर्मी पैदा हो गई है. मुलाकात के बाद शशिकला ने तस्वीरें भी साझा कीं. तस्वीरें शेयर करते हुए शशिकला ने ये बताया कि वह दादा साहब फाल्के पुरस्कार जीतने पर रजनिकांत को बधाई देने और उनकी सेहत के बारे में जानकारी लेने पहुंची थी. मुलाकात के बाद जारी की गई तस्वीरों में शशिकला और रजनिकांत के साथ रजनीकांत का पत्नी लता भी दिखाई दी.
ये एक 'शिष्टाचार भेंट' थी- शशिकला
मुलाकात के बाद शशिकला ने कहा कि दिग्गज अभिनेता अक्टूबर में दिमाग में खून के बहाव से जुड़ी हुई बिमारी से अब पूरी तरह से उबर चुके हैं. अन्नाद्रमुक पार्टी से निष्कासित होने के बाद शशिकला ने सोमवार को पोएस गार्डन स्थित रजनीकांत के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की. शशिकला ने इस मुलाकात को एक 'शिष्टाचार भेंट' बताते हुए एक बयान में कहा कि उन्होंने अभिनेता के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली और उन्हें प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किए जाने पर बधाई और शुभकामनाएं दीं.
एक दूसरे के पड़ोसी भी रह चुके हैं शशिकला और रजनीकांत
शशिकला और रजनीकांत दोनों ही अलग-अलग वजहों से तमिलनाडु की राजनीतिक में चर्चा में बने रहते हैं. इसके अलावा शशिकला और रजनीकांत पोएस गार्डन में पूर्व पड़ोसी हैं. यहां पर रजनीकांत और दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री जय ललिता 'वेद निलयम' नाम के अपने बंगले में रहती थी. ये बंगला अब कानूनी रूप से फंसा हुआ है, बता दें कि शशिकला, जयललिता के साथ कम से कम तीन दशकों तक यहां रहीं.
2020 में रजनीकांत ने छोड़ दी थी राजनीति
70 वर्षिय रजनीकांत को अक्टूबर में नई दिल्ली में आयोजित 67 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू से दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिला. दुनिया भर में मशहूर एक्टर रजनीकांत ने साल 2017 में राजनीति में आने का ऐलान किया था, और अपनी पार्टी रजनी मक्कल मंदरम बनाई थी. लेकिन 2020 में रजनीकांत ने स्वास्थ्य कारणों और कोविड -19 महामारी का हवाला देते हुए अपनी पार्टी को भंग कर दिया था. रजनीकांत के पॉलिटिक्स में आने से वहां की राजनीति में नई लहर आने की उम्मीद जताई जा रही थी, हांलाकि भाजपा तमिलनाडु की राजनीति में पैर जमाने की कोशिश करती रही है, लेकिन 1967 में काग्रेंस के सत्ता खोने के बाद राज्य में तब से ही केवल द्रमुक या अन्नाद्रमुक का बोलबाला रहा है.