Thalapathy Vijay Floor Test
Thalapathy Vijay Floor Test
Tamil Nadu CM Vijay Floor Test: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे जारी होने के बाद किसी भी दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ है. एक्टर से राजनेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) ने सबसे अधिक 108 सीटों पर जीत दर्ज की है. राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने सबसे बड़ी पार्टी टीवीके के मुखिया विजय को मुख्यमंत्री पद की शपथ तो दिला दी है लेकिन विजय सरकार 13 मई 2026 को फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया है. थलपति विजय को बहुमत साबित करने के लिए 118 विधायक चाहिए. विधानसभा में बहुमत साबित करने में फेल होने पर मुख्यमंत्री विजय को इस्तीफा देना पड़ेगा और बहुमत साबित कर लेने पर विजय सरकार पर मुहर लग जाएगी. आइए जानते हैं फ्लोर टेस्ट क्या होता है, कैसे होता है, पूरी प्रक्रिया कौन कराता है?
विजय की पार्टी टीवीके को इन पार्टियों का समर्थन
विजय की पार्टी टीवीके को पांच पार्टियों कांग्रेस, सीपीआई, सीपीआई (एम), IUML और VCK के विधायकों का समर्थन मिला है. इन पार्टियों के कुल 13 विधायक हैं. टीवीके के 108 विधायक और इन पांचों पार्टियों के 13 विधायकों को मिलाकर टोटल 121 विधायक हो जा रहे हैं. विजय ने दो सीटों पर जीत दर्ज की है. ऐसे में उन्हें एक सीट छोड़नी होगी. इसके बावजूद विजय की पार्टी के पास 120 विधायकों की संख्या रहेगी. ऐसे में विजय को फ्लोर टेस्ट पास करने में कोई परेशानी होने की संभावना नहीं है.
टीवीके और उसे समर्थन देने वाली पार्टियों के पास कितनी सीटें
1. टीवीके: 108 सीटें
2. कांग्रेस: 5 सीटें
3. सीपीआई: 2 सीटें
4. सीपीआई (एम): 2 सीटें
5. वीसीके: 2 सीटें
6. आईयूएमएल: 2 सीटें
7. टोटल: 121 सीटें
क्या होता है फ्लोर टेस्ट
फ्लोर टेस्ट को हिंदी में विश्वासमत कहा जाता है. फ्लोर टेस्ट केंद्र में लोकसभा में और राज्य में विधानसभा में होता है. फ्लोर टेस्ट का उद्देश्य यह जानना होता है कि सरकार के पास बहुमत है या नहीं. हमारे संविधान में व्यवस्था है कि राज्यपाल राज्य के मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए कह सकता है. फ्लोर टेस्ट में चुनाव में जीते हुए विधायक अपने मत के जरिए सरकार के भविष्य का निर्णय करते हैं.
क्या होता है फ्लोर टेस्ट में फेल होने पर
आपको मालूम हो कि जब किसी एक दल को विधानसभा में बहुमत प्राप्त होता है तो राज्यपाल उस दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है. यदि बहुमत पर सवाल उठाया जाता है तो बहुमत का दावा करने वाले पार्टी के नेता को विधानसभा में फ्लोर टेस्ट पास करना होता है. विधानसभा में बहुमत साबित करने में फेल होने पर मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है.
कौन कराता है फ्लोर टेस्ट
आपको मालूम हो कि राज्यपाल भले ही फ्लोर टेस्ट का आदेश देते हैं लेकिन फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया के दौरान राज्यपाल का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है. यदि किसी राज्य का फ्लोर टेस्ट है तो उस राज्य के विधानसभा के अध्यक्ष यानी स्पीकर कराते हैं. यदि स्पीकर का चुनाव नहीं हुआ हो तो प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया जाता है. प्रोटेम स्पीकर के देख-रेख में फ्लोर टेस्ट कराया जाता है. सुप्रीम कोर्ट भी अपने एक आदेश में ऐसा कह चुका है. प्रोटेम स्पीकर ही फ्लोर टेस्ट से संबंधित सारे फैसले लेते हैं.
फ्लोर टेस्ट की क्या है प्रक्रिया
फ्लोर टेस्ट के दौरान सबसे पहले स्पीकर या प्रोटेम स्पीकर विधायकों से ध्वनिमत से सरकार के पक्ष और विपक्ष में समर्थन जानने की कोशिश करते हैं. इसके बाद कोरम बेल बजती है और सदन में मौजूद विधायकों को पक्ष और विपक्ष में बंटने के लिए कहा जाता है. विधायक सदन में बने ‘हां या नहीं’ यानी समर्थन या विरोध वाली लॉबी की ओर रुख करते हैं. इसके बाद पक्ष-विपक्ष में बंटे विधायकों की गिनती की जाती है. फिर स्पीकर इसी आधार पर नतीजे घोषित करते हैं. यदि सरकार के समर्थन में जरूरी विधायकों का समर्थन होता है तो सरकार बच जाती है और अगर विरोध में ज्यादा विधायकों का समर्थन होता है तो सरकार गिर जाती है.
बहुमत के लिए चाहिए कितना समर्थन
आपको मालूम हो कि राज्य में सरकार चलाने के लिए मुख्यमंत्री के पास सदन का भरोसा होना चाहिए. इसका मतलब है राज्य सरकार के पास विधानसभा में बहुमत हो. सरकार में बने रहने के लिए सत्ताधारी पार्टी के पास विधानसभा में 50 फीसदी से एक ज्यादा विधायकों का समर्थन होना जरूरी है.
पार्टियां फ्लोर टेस्ट से पहले जारी करती हैं व्हिप
आपको मालूम हो कि जब भी सदन में फ्लोर टेस्ट होना होता है, तब सभी पार्टियां अपने विधायकों को व्हिप जारी करती हैं. व्हिप के जरिए सभी दल अपने विधायकों को हर हाल में विधानसभा में मौजूद रहने के लिए कहते हैं. यदि कोई विधायक व्हिप का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ दल बदल कानून के तहत कार्रवाई की जाती है.
...तो फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे देते हैं सीएम
कई बार देखा जाता है कि मुख्यमंत्री फ्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे देते हैं. ऐसा तब होता है जब उनको लगता है कि उनकी सरकार के पक्ष में पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं हैं या फिर सदन के भीतर खेल हो सकता है और उनके विधायक दूसरे पक्ष में जा सकते हैं. ऐसे में फ्लोर टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ती है और सरकार गिर जाती है.