Supreme Court
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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल कुछ दिन बोलचाल बंद होना या सामान्य वैवाहिक विवाद आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बन सकते. उकसाने का अपराध साबित करने के लिए यह सिद्ध होना आवश्यक है कि आरोपी ने कोई ऐसा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कार्य किया हो, जिससे पीड़ित के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प ही न बचा हो. कानूनी रूप से स्पष्टता के लिए कई बिंदु महत्वपूर्ण हैं. अव्वल तो ये कि खुदकुशी के लिए उकसाने या मजबूर करने का प्रत्यक्ष प्रमाण हो.
उकसाने के आरोप सिद्ध करने के लिए सबूत होने चाहिए- कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप सिद्ध करने के लिए सबूत होने चाहिए कि आरोपी ने पीड़ित को जानबूझकर ऐसा करने के लिए उकसाया या फिर मजबूर किया. सिर्फ 13 दिन पति पत्नी के बीच बातचीत बंद हुई थी. इसी पर पत्नी ने मायके में ही फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली. फिर उसके मायके वालों ने इल्ज़ाम पति पर लगाया.
दहेज प्रताड़ना का आरोप लगा-
घर वालों का कहना है कि शादी में उन्होंने तीन लाख रुपए और 20 तोले सोने के गहने दिए थे. फिर भी पति अक्सर पत्नी को मायके से और धन लाने का दबाव बनाता था.
जबकि रिकॉर्ड कुछ और कहानी कह रहे थे. पति मस्कट में काम करता था. पत्नी को भी ले जाने की बात थी. वीजा में दिक्कत आने से वो साथ नहीं जा पाया. झगड़ा हुआ. पति चला गया. मस्कट जाने के बाद बातचीत नहीं हुई. पीछे से पत्नी ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली.
निचली अदालत ने दी 3 साल की सजा-
मृतका के मायके वालों ने पति, उसके माता पिता और एक नाबालिग सहित दो देवरों पर दहेज प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए मजबूर करने की एफआईआर दर्ज कर दी. निचली अदालत ने तीन साल कैद की सजा सुनाई. हाईकोर्ट ने उसे बरकरार रखा.
कुछ दिनों से बातचीत न होना क्रूरता नहीं- कोर्ट
क्रूरता की परिभाषा स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल कुछ दिनों तक बातचीत न होना या सामान्य पारिवारिक तनाव कानून की नजर में 'क्रूरता' नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदूरकर की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि यह आचरण इतना गंभीर और बाध्यकारी होना चाहिए जो महिला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दे.
सामान्य मनमुटाव या भावनात्मक विवाद और तनाव को स्वचालित रूप से आपराधिक उकसाव नहीं माना जा सकता. लिहाजा निचली अदालतों ने आरोपी के खिलाफ 498 ए का आरोप जिन आधार पर मान कर तीन साल कारावास की सजा दी है वो न्याय सम्मत नहीं है.
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