Akhilesh Yadav Rally
Akhilesh Yadav Rally
नोएडा के दादरी में समाजवादी पार्टी की भाईचारा भागीदारी रैली ने बीजेपी की नींद उड़ा दी है. पिछले 10 सालों में यह पहला मौका है, जब समाजवादी पार्टी ने अपने गढ़ से इतर जाकर इतनी बड़ी रैली की. दरअसल जब से जयंत चौधरी से अखिलेश यादव का गठबंधन टूटा, यह कहें जब से जयंत चौधरी ने सपा का साथ छोड़ा और भाजपा का दामन थामा, उसके बाद से ही समाजवादी पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अकेली और अलग-थलग पड़ गई थी. उसके पास मुस्लिम वोटों के अलावा कोई अपना पुख्ता वोट बैंक नहीं था. जब जयंत साथ थे तो जाट मुस्लिम समीकरण ने इंडिया एलायंस को सफलता दिलाई थी. लेकिन जयंत चौधरी के पाला बदलते ही अखिलेश यादव के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश दूर की कौड़ी बन गया था.
अखिलेश का गुर्जर-मुसलमान समीकरण-
लेकिन जयंत के जाते ही अखिलेश यादव ने अपना गियर बदला और पश्चिम के समीकरण में जाट मुसलमान की जगह गुर्जर और मुसलमान का समीकरण बनाना तय किया. बता दें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव आबादी बहुत छोटी है. ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम यादव कॉम्बिनेशन नहीं चल सकता.
पहले से ही अखिलेश यादव के पास अतुल प्रधान जैसा जुझारू गुर्जर चेहरा था. जिसका मेरठ के आसपास के गुर्जरों में प्रभाव माना जाता है, जबकि सांसद इकरा हसन जिनकी मुस्लिम गुर्जरों में बड़ी पकड़ बन गई है. इसके बाद भी गुर्जरों को अपने पाले में लाने के लिए अखिलेश यादव ने पार्टी में नए चेहरे माने जाने वाले राजकुमार भाटी को पिछले कुछ समय से सक्रिय किया. राजकुमार भाटी अपने बेबाक और नास्तिक विचारों के लिए जाने जाते रहे हैं. पिछले काफी समय से इन नेताओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को एक नया आधार दिया है. जाट लगभग अखिलेश का साथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गए तो अखिलेश यादव ने नया कॉम्बिनेशन खड़ा किया. हालांकि आज भी माना जाता है कि गुर्जर बिरादरी का बड़ा वोट बैंक भाजपा के साथ है, जो पहले कभी बसपा का आधार हुआ करता था.
जाट समुदाय का झुकाव किधर?
उधर जाट नेता जयंत चौधरी के मोदी सरकार में मंत्री बनने के बाद कमोबेश माना जा रहा है कि जाट भाजपा के साथ जुड़ गया, लेकिन एक दिन पहले महाराजा सूरजमल की मूर्ति अनावरण के दरान जाट शब्द को हटाने को लेकर प्रशासन से हुए विवाद के बाद बीजेपी के अपने जाट चेहरे संजीव बालियान भड़क गए और अपनी ही सरकार को खूब खरी खोटी सुना दिया. उन्होंने कहा कि मैं खून का घूंट पीकर रह गया, नहीं तो किसी की मां ने दूध नहीं पिलाया है कि मुझे रोक सके.
दरअसल भाजपा के भीतर उनके अपने जाट नेता भी जयंत के बढ़ते कद से परेशान है और भाजपा के भीतर जाट नेताओं में यह सोच बन रही है कि भाजपा ने अपने जाट वोट बैंक को जयंत चौधरी को आउटसोर्स कर दिया है. पार्टी के खिलाफ तो कोई नेता नहीं बोलता. लेकिन जिस तरीके से संजीव बालियान का गुस्सा फूटा है. यह दिखाता है कि भाजपा के जाट वोट बैंक में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.
अखिलेश यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर, मुसलमान और दलित का समीकरण बनाकर चलना चाहते हैं. जिसकी पहली परीक्षा तो 2027 के विधानसभा चुनाव में ही होगी. लेकिन भाईचारा भागीदारी रैली में उमड़ी भीड़ ने बीजेपी के माथे पर पसीना तो ला ही दिया है.
जिस नोएडा को कभी अखिलेश यादव सियासी अभिशाप की तरह देखते थे. इस बार 2027 का बिगुल उन्होंने नोएडा के दादरी से ही फूंका, रैली कर अखिलेश यादव ने पश्चिम में सियासत को तो गरमा दिया है. इसके बाद मायावती भी बेहद सक्रिय दिखाई देने लगी हैं. मायावती ने अचानक पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की अपनी मांग भी शुरू करती है. अखिलेश यादव भी उसके समर्थन में दिखाई दे रहे हैं. मायावती को चिंता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अगर दलित, गुर्जर और मुसलमान के वोट में अखिलेश यादव ने सेंध लगा दी तो बसपा के लिए यूपी की सियासत लगभग खत्म सी हो जाएगी.
बहरहाल अखिलेश यादव की इस रैली के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत गरमाई है. एक तरफ बीजेपी की नजर अखिलेश की बड़ी रैली पर है तो मायावती भी डैमेज कंट्रोल में जुट गई हैं.
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