Manoj Pandey and Yogi Adityanath
Manoj Pandey and Yogi Adityanath
बीजेपी उम्मीदवार रहे संजय सेठ को राज्यसभा पहुंचने में जिन सपा के विधायकों ने बगावत की. उसमें आधा दर्जन नाम है. लेकिन जब योगी 2.0 की सरकार का मंत्रीमंडल विस्तार हुआ तो मंत्री पद सिर्फ मनोज पांडे को मिला. हालांकि मंत्री बनाए जाने के बाद बगावत करने वाले राकेश प्रताप सिंह का दर्द भी छलक गया. राकेश प्रताप सिंह ने मनोज पांडे को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मंत्री बनने के बाद मैंने उन्हें फोन किया था. लेकिन उनका फोन नहीं उठा, ना ही कॉल बैक आया. शायद अब उनकी व्यस्तता बढ़ गई होगी.
मनोज पांडे ने क्यों छोड़ा था बीजेपी?
दरअसल समाजवादी पार्टी के कई विधायकों ने राज्यसभा के वक्त बगावत की थी. लेकिन सबसे बड़ा कैच तब भी मनोज पांडे ही माने गए थे, क्योंकि मनोज पांडे तब समाजवादी पार्टी के विधानसभा में मुख्य सचेतक और अखिलेश यादव के बेहद करीबी माने जाते थे. मनोज पांडे ने स्वीकार भी किया है कि अखिलेश यादव ने उनका कहा कभी नहीं टाला और मुलायम सिंह यादव की कोई बात उन्होंने कभी नहीं उठाई. लेकिन मनोज पांडे ने सपा छोड़ने की तब जो वजह बताई थी, वह सिर्फ स्वामी प्रसाद मौर्य का राम और रामचरितमानस के विरोध का स्टैंड था. बीजेपी ने इस मौके को पकड़ा और मनोज पांडे को लपक लिया.
सनातन को लेकर मनोज का कड़क स्टैंड-
सपा में रहते हुए मनोज पांडे का भगवान राम और सनातन को लेकर एक कड़क स्टैंड, इसके अलावा रायबरेली और आसपास के इलाकों में ब्राह्मणों पर उनका प्रभाव भाजपा के लिए बेहद अहम था. हाल में यूजीसी के मद्दे पर बीजेपी जिस तरीके से ब्राह्मणों के निशाने पर आई. लेकिन मनोज पांडे यूजीसी बिल के मुद्दे पर ब्राह्मण चेतना के साथ खड़े दिखे. इसने भी यह तय कर दिया था कि योगी कैबिनेट में मनोज पांडे बड़े ब्राह्मण चेहरे के तौर पर दिखाई देंगे , वही हुआ.
मनोज पांडे का प्रभाव-
मनोज पांडे के प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमित शाह दो बार मनोज पांडे के रायबरेली आवास पर आ चुके हैं. सोनिया गांधी भी उनके रायबरेली के घर पर आ चुकी है. ऐसे में रायबरेली के बड़े ब्राह्मण चेहरे के तौर पर इनकी पहचान स्थापित है. 2012 से लगातार रायबरेली ऊंचाहार सीट जीत रहे हैं और वह भी उन विपरीत परिस्थितियों में जब बीजेपी की सुनामी 2017 विधानसभा चुनाव और 2022 के दो तिहाई की जीत बीजेपी के खाते में रही है.
आसान नहीं रहा मनोज पांडे का सियासी सफर-
रायबरेली में मनोज पांडे का सियासी सफर कभी आसान नहीं रहा. अदिति सिंह के पिता बाहुबली स्वर्गीय अखिलेश सिंह से उनकी अदावत कभी छुपी नहीं रही और दिनेश प्रताप सिंह से छत्तीस का आंकड़ा रहा और दूसरे कई विधायकों से भी उनकी पटरी नहीं बैठी. लेकिन सपा से उनका मोह भंग होना तब शुरू हुआ, जब समाजवादी पार्टी ने 2022 चुनाव के पहले स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने पार्टी में ले लिया. ऊंचाहार में स्वामी प्रसाद मौर्य और मनोज पांडे की सियासी दश्मनी किसी से छुपी नहीं थी. यह लड़ाई भाजपा के पहले बसपा और सपा की अदालत के वक्त से ही है. दोनों ने एक दूसरे को हराने में कोई और कसर कभी नहीं छोड़ी.
मुलायम सिंह की छत्रछाया में पनपे मनोज पांडे-
मनोज पांडे की राजनीति मुलायम सिंह यादव की छत्रछाया में पली बढ़ी और पनपी. युवा नेता के तौर पर मुलायम सिंह यादव मनोज पांडे मानते रहे. सबसे पहले दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री मुलायम सिंह यादव ने बनाया. 2012 में जब अखिलेश यादव की सरकार बनी तो अखिलेश यादव ने उन्हें अपने कैबिनेट में लिया. कुछ चुनिंदा नेताओं जिनकी पहुंच अखिलेश यादव के घर तक थी, उसमें मनोज पांडे का नाम भी है. अखिलेश यादव भी हमेशा मनोज पांडे को अपने पिता की तरह ही सम्मान देते रहे. लेकिन इसे मनोज पांडे की महत्वाकांक्षा कहें या फिर स्वामी प्रसाद मौर्य से सियासी अदावत की पराकाष्ठा, दोनों के राह अब जुदा हो चुके हैं.
बीजेपी के पास लगभग सभी क्षेत्रों में कोई न कोई चेहरा नेता था. लेकिन अवध में भाजपा के पास कोई चेहरा नहीं था. बीजेपी को भी मध्य यूपी या अवध में एक ब्राह्मण चेहरे की तलाश थी, जो उन्हें मनोज पांडे के तौर पर मिल गई है. भाजपा को लगता है कि मनोज पांडे के अब पूरी तरीके से बीजेपी के साथ आ जाने और उनके मंत्री बन जाने से इस इलाके में ब्राह्मण नेतृत्व की कमी पूरी कर सकेगी और ब्राह्मणों में पनपी नाराजगी को कम करने में वह सफल होगी.
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