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बांकीपुर उपचुनाव में PK की जीत से यूपी में बदलेगा समीकरण? क्या अखिलेश यादव लगा पाएंगे बीजेपी के सवर्ण वोट बैंक में सेंध

बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत की चर्चा उत्तर प्रदेश के सियास गलियारों में खूब हो रही है. समाजवादी पार्टी ने अचानक ब्राह्मणों पर फोकस बढ़ा दिया है. जनेश्वर मिश्र जयंती पर अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश की. अब सवाल उठता है कि क्या यूपी में ब्राह्मण भी नए समीकरण तलाश रहे हैं?

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Akhilesh Yadav with others leaders (Photo/PTI) Akhilesh Yadav with others leaders (Photo/PTI)

बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत के बाद क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नए सियासी समीकरण बन सकते हैं और क्या इसका असर 2027 यूपी चुनाव में ब्राह्मण वोट बैंक पर पड़ेगा? ये सवाल यूपी की सियासी फिजाओं में गूंजने लगे हैं. बीजेपी के खिलाफ एक बड़े ब्राह्मण चेहरे पीके की जीत के बाद समाजवादी पार्टी ने अचानक ब्राह्मणों पर अपना फोकस बढ़ा दिया है. जनेश्वर मिश्र जयंती पर आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन के राजनीतिक मायने बिल्कुल साफ हैं 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अपने परंपरागत ब्राह्मण वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाना, क्या ये सपा कर पाएगी? क्या सपा नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने में सफल होगी?

बीजेपी के गढ़ में पीके की जीत-
बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत के बाद यूपी की राजनीति का समीकरण बदलने की चर्चा शुरू हो चुकी है. बिहार के बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम आने के बाद सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी इसकी चर्चा तेज हो गई है. माना जा रहा है कि जिस सीट को लंबे समय तक बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां प्रशांत किशोर की जीत ने पूरा सियासी विमर्श बदल दिया है.

चुनाव परिणामों के बाद सामने आए राजनीतिक विश्लेषणों में यह दावा किया जा रहा है कि बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोटरों ब्राह्मण, भूमिहार, ठाकुर, कायस्थ और बनिया समुदाय के एक हिस्से ने पार्टी से दूरी बनाई. अगर यह ट्रेंड आगे बढ़ता है तो इसका असर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी दिखाई दे सकता है, जहां 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं.

इसी वजह से अब सवाल उठने लगा है कि क्या बांकीपुर का राजनीतिक संदेश उत्तर प्रदेश तक पहुंचेगा और क्या समाजवादी पार्टी इसी आधार पर नया चुनावी नैरेटिव बनाने की कोशिश करेगा.

समाजवादी पार्टी का ब्राह्मण सम्मेलन-
समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. बांकीपुर के नतीजों के कुछ ही दिनों बाद लखनऊ में समाजवादी पार्टी ने जनेश्वर मिश्र की जयंती पर ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज की मौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी. अब तक अखिलेश यादव लगातार पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की राजनीति को आगे बढ़ा रहे थे, लेकिन इस सम्मेलन में उन्होंने पीडीए की नई व्याख्या करते हुए कहा कि 'पी' का मतलब पंडित भी है. उन्होंने यह भी कहा कि ब्राह्मण समाज भी खुद को पीड़ित महसूस कर रहा है.

कृष्ण-सुदामा की दोस्ती का जिक्र-
अखिलेश यादव अब ब्राह्मण को जोड़ने की हर संभव कोशिश में जुटे हैं, यही वजह है कि उन्होंने भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की पौराणिक कहानी का भी जिक्र अपने भाषण में किया. जिसमें यदुवंशियों और गरीब ब्राह्मण की कहानी घर-घर में प्रचलित है. जिस PDA को अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक या आधी आबादी का रखा था. अब उसके PD को उन्होंने पंडित शब्द दे दिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी अब अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ-साथ सवर्ण समाज, खासकर ब्राह्मणों के बीच भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में यह सम्मेलन केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं बल्कि 2027 की चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

क्या बीजेपी के सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश सफल होगी?
उत्तर प्रदेश में 2014 के बाद से ब्राह्मण समेत अधिकांश सवर्ण समुदाय बीजेपी के सबसे मजबूत समर्थकों में रहे हैं. कई राजनीतिक विवादों और एनकाउंटर जैसे मुद्दों के बावजूद यह वोट बैंक बड़े पैमाने पर बीजेपी के साथ बना रहा. हालांकि बिहार में भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों और बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों ने विपक्ष को यह भरोसा दिया है कि सवर्ण समाज के एक हिस्से तक पहुंच बनाई जा सकती है.

इसी रणनीति के तहत समाजवादी पार्टी लगातार ब्राह्मणों को साधने की कोशिश करती दिखाई दे रही है. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी अपने परंपरागत सवर्ण वोट बैंक को पूरी तरह अपने साथ बनाए रख पाएगी या फिर विपक्ष 2027 के चुनाव से पहले नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण खड़ा करने में सफल होगा. आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा फोकस इसी सवाल पर रहने वाला है.

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