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Varanasi Nati Imli Bharat Milap: ये है ऐतिहासिक नाटी इमली भरत मिलाप, जानें सूर्य की ढलती किरणों के बीच 484 साल पुरानी परंपरा की खासियत

वाराणसी में 484 साल पुरानी परंपरा के अनुसार नाटी इमली का ऐतिहासिक भरत मिलाप धूमधाम से मनाया जाता है. संत मेधा भगत द्वारा शुरू की गई इस वाल्मीकि रामायण आधारित लीला में ठीक शाम 4:40 बजे सूर्य की किरणों के बीच चारों भाइयों का मिलन होता है, जिसे देखने लाखों श्रद्धालुओं के साथ खुद काशी नरेश पहुंचते हैं.

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Varanasi Nati Imli Bharat Milap Varanasi Nati Imli Bharat Milap

वाराणसी में नवरात्रि और दशहरा के बाद रावण दहन के साथ ही उत्सवों का सिलसिला आगे बढ़ता है. काशी में भरत मिलाप का पर्व भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. शहर में कई जगह इसका आयोजन होता है, लेकिन चित्रकूट रामलीला समिति की ओर से आयोजित नाटी इमली का ऐतिहासिक भरत मिलाप खास पहचान रखता है. इस लीला को देखने के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु मैदान में जुटते हैं.

नाटी इमली के भरत मिलाप की शुरुआत करीब 484 साल पहले संत मेधा भगत ने की थी. मान्यता है कि संत मेधा भगत को सरयू नदी के किनारे सपने में भगवान राम ने काशी में होने वाले भरत मिलाप के दौरान दर्शन देने का आशीर्वाद दिया था. इसके बाद उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की. कहा जाता है कि भरत मिलाप मैदान में लीला देखते हुए ही संत मेधा भगत ने अपने प्राण त्याग दिए थे. तभी से श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता चली आ रही है कि भरत मिलाप के मंचन के दौरान स्वयं भगवान राम प्रकट होकर भक्तों को दर्शन देते हैं और उनके दुख-कष्ट दूर करते हैं. इसी आस्था के चलते काशी के साथ-साथ वाराणसी के दूर-दराज के इलाकों से भी लोग इस आयोजन में पहुंचते हैं.

सूर्य की किरणों के साथ होता है चारों भाइयों का मिलन
नाटी इमली के भरत मिलाप की सबसे खास बात इसका समय है. हर साल शाम को ठीक 4 बजकर 40 मिनट पर, जब अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें भरत मिलाप स्थल पर पड़ती हैं, तब चारों भाइयों का मिलन होता है. इस पल को देखने के लिए श्रद्धालु पहले से ही मैदान में जुटने लगते हैं. सूर्य की किरणों के बीच होने वाला यह दृश्य लोगों के लिए बेहद खास होता है. इस भरत मिलाप को काशी के लक्खा मेलों में गिना जाता है. इसकी एक और खास बात यह है कि यह रामलीला वाल्मीकि रामायण पर आधारित है. मान्यता के मुताबिक, जब इस आयोजन की शुरुआत हुई थी, उस समय रामचरितमानस का अस्तित्व नहीं था. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस लीला के दर्शन मात्र से उनके दुख और कष्ट दूर हो जाते हैं.

कई पीढ़ियों से निभाई जा रही है परंपरा
नाटी इमली के भरत मिलाप से स्थानीय लोगों की आस्था और परंपरा गहराई से जुड़ी हुई है. इलाके के कई परिवार पीढ़ियों से इस लीला को देखने आते रहे हैं. वहीं, यादव बंधु भी कई पीढ़ियों से भगवान राम और लक्ष्मण के भारी-भरकम रथ को अपने कंधों पर उठाकर लाने की परंपरा निभाते आ रहे हैं. इस आयोजन में काशी नरेश की मौजूदगी भी खास आकर्षण रहती है. परंपरा के अनुसार, काशी नरेश हाथी पर सवार होकर भरत मिलाप देखने और प्रभु राम के दर्शन करने पहुंचते हैं. इस बार भी काशी नरेश हाथी पर सवार होकर पहुंचे, जबकि यादव बंधु अपने कंधों पर भगवान राम के भारी रथ को उठाकर लाते नजर आए हैं. 
 

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