Ethanol Fuel
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अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान तनाव के बाद भारत सहित पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की किल्लत शुरू हो गई है. पेट्रोल और डीजल के दामों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है. पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों के बीच भारत सरकार गन्ना, अनाज और खेती के कचरे से बनने वाले इथेनॉल को बढ़ावा दे रही है. इथेनॉल के इस्तेमाल से तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी. इससे पेट्रोल की जगह पूरी तरह इथेनॉल से गाड़ियां दौड़ेंगी. सरकार ने E85 और E100 ईंधन का इस्तेमाल करने की बात कही है. आइए जानते हैं E85 और E100 ईंधन क्या है और इससे क्या-क्या चुनौतियां आएंगी?
E5 से E20 तक, अब E85 और E100 तक पहुंचने का है लक्ष्य
आपको मालूम हो कि हमारे देश की सरकार ने पिछले एक दशक में पेट्रोल की जगह इथेनॉल के इस्तेमाल में तेजी से प्रगति की है. सबसे पहले E5 की शुरुआत हुई थी. उसके बाद सरकार साल 2022 तक E10 पर पहुंची और इसके बाद E20 तक पहुंच गई है. हमारे देश में अभी तक जो पेट्रोल इंजन हैं, वह E20 क्षमता के हैं, यानी पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाया जा सकता है. सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के तहत गत 1 अप्रैल से अनिवार्य भी कर दिया है. अब सभी तरह के पेट्रोल में कम से कम 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जा रहा है.
केंद्र सरकार का अब यह प्रयास है कि इसे बढ़ाकर E85 और E100 क्षमता तक लाया जाए ताकि पेट्रोल के बिना ही इथेनॉल पर वाहनों को चलाया जा सके. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने केंद्रीय मोटर वाहन नियमों में संशोधन की रूपरेखा प्रस्तुत की है, जिससे देश में एडवांस इथेनॉल आधारित ईंधनों का उपयोग संभव हो सकेगा. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में 100 प्रतिशत इथेनॉल से वाहनों के दौड़ने के संकेत दिए थे. उन्होंने ऊर्जा जरूरतों में आत्मनिर्भर बनने की कोशिशों के संदर्भ में कहा था कि हमें 100% इथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल करने का प्रयास करना चाहिए. इथेनॉल ब्लेंडिंग का मतलब पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से होता है.
क्या है E85 और E100 ईंधन?
अब आइए जानते हैं E85 और E100 ईंधन क्या है. आपको मालूम हो कि E85 और E100 में शामिल E का मतलब इथेनॉल है और इसके साथ लिखी संख्या यह बताती है कि उस ईंधन में कितने प्रतिशत इथेनॉल मिला हुआ है. E85 ईंधन में 85% इथेनॉल और 15% पेट्रोल का मिश्रण होगा. E100 ईंधन में 100% इथेनॉल होता है यानी 0% पेट्रोल. यह पूरी तरह से शुद्ध बायोफ्यूल है.
क्यों E85 और E100 ईंधन की पड़ी जरूरत
आपको मालूम हो कि इथेनॉल एक प्रकार का रिन्यूएबल बायोफ्यूल है, जिसे गन्ना, मक्का, टूटे चावल और कृषि अपशिष्ट से बनाया जाता है. पहले इनसे चीनी निकाली जाती है, इसके बाद इसमें यीस्ट मिलाया जाता है. जो इस शुगर को इथेनॉल और गैस में बदल देता है. इस प्रक्रिया को फर्मेंटेंशन कहते हैं. इसके बाद जो मिश्रण तैयार होता है उसे डिस्टलेशन कर पानी से अलग किया जाता है. यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद इथेनॉल को ईंधन या अन्य जरूरतों में इस्तेमाल कर सकते हैं.शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल की उत्पादन लागत कम होती है. 100 प्रतिशत इथेनॉल फ्यूल पेट्रोल के मुकाबले बेहद सस्ता होता है.
आपको मालूम हो कि हमारी सरकार जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से खरीदती है. इस पर हर साल लाखों-करोड़ों रुपए खर्च होते हैं. इथेनॉल के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पेट्रोल के आयात पर निर्भरता कम होगी. इसी को देखते हुए हमारी सरकार इथेनॉल को बढ़ावा दे रही है. इथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है. भारत में इथेनॉल की कीमत 60 से 70 रुपए प्रति लीटर रहने का अनुमान है. पेट्रोल से इथेनॉल की कीमत कम होना भी इथेनॉल को बढ़ावा देने का मुख्य कारण है. अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान तनाव के बाद कच्चे तेल के आयात में काफी परेशानी हो रही है. E85 और E100 ईंधन से पेट्रोल के आयात पर भारत की निर्भरता काफी कम हो जाएगी. इसके चलते भी E85 और E100 की जरूरत महसूस की जा रही है. इथेनॉल के प्रयोग से पर्यावरण बचाने की कोशिशों को भी बल मिलेगा. इसके अलावा किसानों की आय में भी बढ़ोतरी होगी. इथेनॉल के इस्तेमाल से पश्चिमी एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के बीच विदेशी मुद्रा की बचत होगी.
इथेनॉल के प्रयोग से क्या-क्या आएंगी चुनौतियां?
इथेनॉल के प्रयोग की सबसे बड़ी चिंता माइलेज को लेकर है. इथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों में पेट्रोल के मुकाबले माइलेज कम हो सकता है. वाहनों को समान दूरी तय करने के लिए अधिक इथेनॉल की जरूरत पड़ेगी. E20 ईंधन के साथ भी माइलेज में 3 से 7% की गिरावट आ सकती है. E100 के साथ यह कमी काफी अधिक हो सकती है, संभावित रूप से 25 से 30% तक. ऐसे में भले ही इथेनॉल 60 से 70 रुपए प्रति लीटर पर बेचा जाता है. इथेनॉल से चलने वाले वाहनों का माइलेज कम होने का मतलब है कि प्रति किलोमीटर लागत पेट्रोल के भुगतान करने के बराबर हो सकती है. ऐसे में इथेनॉल पंप पर दिखने वाली बचत उपभोक्ताओं के लिए वास्तविक बचत में तब्दील नहीं हो सकती है. दूसरी परेशानी यह है कि वाहन की संगतता (compatibility) है. नए वाहनों को मामूली संशोधनों के साथ E20 ईंधन को संभालने के लिए डिजाइन किया जा रहा है.
अभी जो कारें या अन्य वाहन हैं वो अधिकतम 20 प्रतिशत इथेनॉल तक के लिए डिजाइन हैं. अधिकांश मौजूदा वाहन उच्च इथेनॉल मिश्रण के लिए अनुकूलित (optimised) नहीं हैं. इथेनॉल पेट्रोल की तुलना में अधिक संक्षारक (corrosive) है. इथेनॉल रबर के पुर्जों को नुकसान पहुंचा सकता है. इथेनॉल ईंधन पंपों को प्रभावित कर सकता है और कोल्ड स्टार्ट के दौरान समस्याएं पैदा कर सकता है. इथेनॉल के इस्तेमाल से इंजन का जीवनकाल कम हो सकता है. इथेनॉल से पुराने वाहनों में जंग लगने का खतरा रहता है, इससे सर्दी के मौसम में वाहन को स्टार्ट करने में परेशानी हो सकती है. E100 का पूरी तरह से उपयोग करने के लिए वाहनों को flex-fuel वाहनों के रूप में डिजाइन करने की आवश्यकता है, जो इथेनॉल और पेट्रोल के अलग-अलग मिश्रण पर चलने में सक्षम हों. हालांकि हमारे देश में ऐसे वाहन अभी भी बहुत कम हैं. अब सवाल उठ रहा है कि क्या उपभोक्ता उन वाहनों के लिए 15000 से 25000 रुपए अतिरिक्त देने को तैयार हैं, जो कम माइलेज दे सकते हैं? इथेनॉल को बनाने में पानी की बहुत ज्यादा खपत होती है. एक लीटर इथेनॉल बनाने में करीब 10790 लीटर पानी लगता है. आपको मालूम हो कि इथेनॉल वाली फसलों में पानी का ज्यादा इस्तेमाल होता है.