Parliament
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संसद में किसी भी विषय पर चर्चा विशिष्ट नियमावली के तहत कराई जाती है. विशेषकर राज्यसभा की नियमावली में नियम 167 और 267 सदन में चर्चा और प्रस्तावों के संचालन प्रक्रिया में खास स्थान रखते हैं. सत्ता पक्ष और विपक्ष में जिरह भी इसी मुद्दे पर अक्सर होती है कि चर्चा किस नियम के तहत हो?
क्या कहता है नियम 167-
संसदीय प्रक्रिया के विशेषज्ञ वकील आर के शर्मा के मुताबिक राज्यसभा संचालन का नियम 167 कहता है कि आम जनहित के किसी भी विषय पर चर्चा केवल तभी हो सकती है, जब सभापति की सहमति से सदन में एक औपचारिक प्रस्ताव यानी मोशन लाया जाए. नियम 267 के तहत कोई भी सांसद सभापति की अनुमति से सदन के उस दिन के पहले से तय और सूचीबद्ध कामकाज यानी लिस्टेड बिजनेस से संबंधित नियमों को स्थगित करने की मांग कर सकता है, ताकि देश के किसी अत्यंत महत्वपूर्ण व तात्कालिक मुद्दे पर तुरंत चर्चा की जा सके.
नियम 167 के राहत अमूमन सामान्य जनहित चर्चा कराई जाती है. यह नियम राज्यसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली के अंतर्गत आता है. इसके तहत सामान्य सार्वजनिक महत्व के किसी भी विषय पर बिना प्रस्ताव के सीधी चर्चा नहीं की जा सकती. चर्चा के लिए प्रस्ताव लाने के लिए राज्यसभा के सभापति की पूर्व सहमति जरूरी होती है.
इस नियम के तहत जब कोई प्रस्ताव रखा जाता है और उस पर चर्चा पूरी हो जाती है, तथा संबंधित मंत्री अपना जवाब दे देते हैं, तब सदन में उस प्रस्ताव और उस पर आए संशोधनों को वोटिंग के लिए रखा जाता है.
क्या है नियम 267-
नियम 267 की विशेषता ये है कि इसके तहत किसी भी बेहद गंभीर और जरूरी राष्ट्रीय मुद्दे पर बहस के लिए सदन के सामान्य निर्धारित एजेंडे को रोकने का अधिकार देता है. इसके लिए सदस्य को लिखित में नोटिस देना होता है. इस पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह से सभापति के विवेक पर निर्भर करता है कि वे इसकी अनुमति दें या मना कर दें.
सभापति और व्यवस्था के स्पष्टीकरण के अनुसार, इसका उपयोग केवल सदन के उस दिन के एजेंडे में शामिल विषयों से जुड़े नियमों को निलंबित करने के लिए ही किया जा सकता है.
सरकार को जवाब देने की परंपरा-
भारतीय संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका (सरकार) सामूहिक रूप से विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है. जब किसी स्वीकृत नियम के तहत सदन में गंभीर मुद्दे पर चर्चा शुरू होती है, तो सरकार की ओर से संबंधित मंत्री या नेता सदन द्वारा चर्चा का उत्तर देना संसदीय परंपरा और जवाबदेही का हिस्सा होता है, हालांकि विशिष्ट नियमों जैसे अल्पकालिक चर्चा (नियम 176) या नियम 267 की बहसों में समय सीमा व प्रक्रिया तय होती है, और औपचारिक रूप से 'वोटिंग' या मत विभाजन द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया मुख्य तौर पर नियम 167 जैसी व्यवस्थाओं में ही स्पष्ट रूप से परिभाषित है.
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