scorecardresearch

Who Was Samarth Ramdas: कौन थे समर्थ रामदास स्वामी? जिनको लेकर धीरेंद्र शास्त्री के बयान पर हो रहा विवाद

समर्थ रामदास स्वामी 17वीं सदी के प्रसिद्ध संत, कवि और आध्यात्मिक गुरु थे, जिनका असली नाम नारायण ठोसर माना जाता है. वह भगवान राम और हनुमान के परम भक्त थे और दासबोध व मनाचे श्लोक जैसी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं.

Samarth Ramdas Swami Samarth Ramdas Swami

समर्थ रामदास स्वामी महाराष्ट्र के उन महान संतों में गिने जाते हैं, जिनका नाम सिर्फ भक्ति और अध्यात्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्र चेतना और स्वराज्य की भावना से भी गहराई से जुड़ा रहा. महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे दक्षिण भारत में उन्हें अत्यंत श्रद्धा के साथ याद किया जाता है. कई स्थानों पर लोग उन्हें भगवान हनुमान का अंश या अवतार मानकर पूजते हैं.

छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन में उनका विशेष स्थान माना जाता है. वह केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि ऐसे मार्गदर्शक थे जिन्होंने समाज को संगठित होने, मजबूत बनने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा दी.

जन्म और प्रारंभिक जीवन
समर्थ रामदास स्वामी का जन्म सन 1608 में महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के जांब नामक स्थान पर हुआ था. उनका मूल नाम नारायण सूर्याजीपंत कुलकर्णी था. बचपन में नारायण स्वभाव से काफी चंचल और शरारती बताए जाते हैं. गांव के लोग अकसर उनकी शिकायत लेकर घर पहुंच जाते थे. एक दिन उनकी माता राणुबाई ने उन्हें समझाते हुए कहा कि दिनभर शरारत करने के बजाय कुछ जिम्मेदारी भी समझनी चाहिए. 

कहा जाता है कि इस बात ने बालक नारायण के मन को गहराई से छू लिया. कुछ दिनों बाद जब वह पूरे दिन दिखाई नहीं दिए, तो घरवालों ने उन्हें ढूंढना शुरू किया. शाम को वह घर के एक कमरे में ध्यान मुद्रा में बैठे मिले. जब माता ने पूछा कि क्या कर रहे हो, तो उन्होंने उत्तर दिया, 'मैं पूरे विश्व की चिंता कर रहा हूं.' यहीं से उनके व्यक्तित्व में एक बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा.

समाज और युवाओं को नई दिशा
इस घटना के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया. उन्होंने युवाओं को समझाया कि मजबूत राष्ट्र के लिए मजबूत शरीर और अनुशासित जीवन बेहद जरूरी है. इसी सोच के साथ उन्होंने व्यायाम, कसरत और शारीरिक शक्ति पर विशेष जोर दिया. वह भगवान राम के साथ-साथ शक्ति और पराक्रम के प्रतीक हनुमान जी के उपासक थे. उन्होंने कई स्थानों पर हनुमान मंदिरों की स्थापना कर लोगों में आत्मबल और साहस जगाने का काम किया.

विवाह मंडप से शुरू हुआ तप का मार्ग
लोककथाओं और ऐतिहासिक विवरणों में यह प्रसंग मिलता है कि जब वह लगभग 12 वर्ष के थे और उनका विवाह हो रहा था, तभी 'शुभमंगल सावधान' शब्द सुनकर वह मंडप छोड़कर वहां से निकल गए. इसके बाद वह टाकली नामक स्थान पर पहुंचे और भगवान श्रीराम की उपासना में लीन हो गए. कहा जाता है कि उन्होंने वहां 12 वर्षों तक कठोर साधना की. इसी दौरान उनका नाम रामदास पड़ा. साधना के बाद अगले 12 वर्षों तक उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया.

स्वराज्य को जीवन का लक्ष्य
भारत भ्रमण के दौरान उन्होंने आम जनता की पीड़ा, अत्याचार और शासकों के दमन को करीब से देखा. इससे उनका हृदय व्यथित हो उठा. उन्होंने केवल मोक्ष या व्यक्तिगत साधना तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि जनता को अन्याय के खिलाफ संगठित होने की प्रेरणा दी. कश्मीर से कन्याकुमारी तक उन्होंने लगभग 1100 मठ और अखाड़ों की स्थापना की. इसका उद्देश्य था लोगों में जागरूकता, साहस और स्वराज्य की भावना जगाना.

शिवाजी महाराज से संबंध
इसी प्रयास के दौरान उनका मिलन छत्रपति शिवाजी महाराज से हुआ. शिवाजी महाराज उनके विचारों और राष्ट्र के लिए किए जा रहे कार्यों से बेहद प्रभावित हुए और उन्हें अपना मार्गदर्शक और गुरु के रुप में मानने लगे. आज भी लोग शिवाजी महाराज का नम लेते ही उनके गुरु को भी याद करते हैं. 

साहित्य और ग्रंथ
समर्थ रामदास स्वामी ने कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की. इनमें सबसे प्रसिद्ध है 'दासबोध', जो मराठी भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और जीवन मार्गदर्शक ग्रंथ माना जाता है. इसके अलावा 'मनाचे श्लोक' भी उनकी एक प्रसिद्ध रचना है, जो मन को अनुशासित और संस्कारित करने की प्रेरणा देती है.

व्यक्तित्व और जीवनशैली
उनका व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली बताया जाता है. दाढ़ी, जटाएं, माथे पर चंदन का तिलक, कंधे पर झोली, हाथ में जपमाला और कमंडल, यह उनका पारंपरिक संत स्वरूप था. कहा जाता है कि वह प्रतिदिन 1200 सूर्य नमस्कार करते थे, जिससे उनका शरीर अत्यंत बलवान था. वह एक स्थान पर अधिक समय तक नहीं रुकते थे और पर्वतों, गुफाओं, नदी किनारों तथा जंगलों में साधना करते रहते थे.

अंतिम समय
अपने जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने सतारा के पास स्थित परली किले में बिताए, जिसे बाद में सज्जनगढ़ कहा जाने लगा. सन 1682 में, 73 वर्ष की आयु में, माघ वद्य नवमी के दिन उन्होंने रामनाम का जाप करते हुए पद्मासन में ब्रह्मलीन होना स्वीकार किया. आज भी सज्जनगढ़ में उनकी समाधि स्थित है और यह दिन दासनवमी के रूप में मनाया जाता है. समर्थ रामदास स्वामी का जीवन केवल भक्ति की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्र, समाज और आत्मबल को जागृत करने वाली प्रेरणा है.

ये भी पढ़ें